मै भ्रष्ट हो चुका हूं लेकिन कब हुआ इसका पता ही नहीं चला – श्वेताभ रंजन

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गाँव की गलियों मे खेलते-खेलते शान्तनु जब बड़ा हो गया तो पिता रामनाथ को बेटे की नौकरी की चिन्ता सताने लगी। शान्तनु फार्म भरता , टेस्ट देता और आने वाला परिणाम निराश कर देता ।

अचानक एक दिन शान्तनु घर लौटा तो उसके चेहरे पर चमक थी लेकिन घर की आर्थिक स्थिति जानते हुए वह संकोच करते हुए बोला पिता जी नौकरी तो मिल जाएगी लेकिन रिश्वत देकर । पिताजी की भौंहे तन गयी लेकिन मा से राय करने के बाद उन्होंने कहा कि तुम प्रयास करो । मै तो सफल नहीं हुआ लेकिन रिश्वत सफल हो गयी और शान्तनु को सरकारी नौकरी मिल गयी ।  नौकरी के पहले दिन पिताजी ने बुलाया , घर की मन्दिर की देवी का आशीर्वाद दिलाया और पिताजी का आशीर्वाद लेने के लिए मैंने जैसे ही उनके चरणों मे सर झुकाया, पिताजी ने मुझे उठा लिया और उठाकर गले से लगा लिया । मेरी नजर पिताजी के चेहरे पर पड़ी तो देखा उनकी आँखे भर आयीं थी, मै भी छोटे बच्चे की तरह उनके सीने से चिपक गया । मा की तरह पिताजी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा – बेटा जीवन मे वो काम कभी नहीं करना जो तुम्हे बुरा लगे, मैने भी छोटे बच्चे की तरह टपाक से प्रश्न किया कि पिताजी रिश्वत देना भी तो बुरा लगा था लेकिन हमने क्यों दिया ?  पिताजी ने कहा बेटे यही सिखाना चाहता हूं कि रिश्वत देना बुरा लगा तो आगे जब भी कोई तुम्हे रिश्वत दे तो मत  लेना। मै रोज आफिस जाता आता, घर मे खुशी थी। दो साल बाद मेरी शादी हो गयी, मै पत्नी के साथ रहने लगा ।

कुछ समय बीता तो पत्नी मुहल्ले मे आने जाने लगी, मुझे गरीब होने का एहसास दिलाने लगी ।

मै पिताजी के सिखाए हुए शब्दों को याद करता और पत्नी की बात को अनसुना कर देता लेकिन कब तक ? अब तो वह हमारे सहकर्मियों के अधिक पैसे कमाने के नुस्खे बताने लगी। कुछ समय और बीता तो घर मे एक बिटिया की किलकारी गूंजी , उसके पालन पोषण मे कोताही नहीं की लेकिन मेरी पत्नी को मेरी कमाई  मे कोताही नजर आने लगी और बात-बात पर ताने सुनाने लगी ।

धीरे- धीरे  घर के मन्दिर की देवी और पिताजी के शब्द धूमिल होते जा रहे थे और पत्नी रूपी देवी के प्रभाव इस शान्तनु पर भारी पड़ते जा रहे थे । मै भी लोगों की अनरगल अपेक्षाओं को पूरा करने लगा बदले मे पत्नी की महत्वाकांक्षा पूरी होने लगी ।

सुना है लोग कहते हैं कि मै भ्रष्ट हो चुका हूं लेकिन कब हुआ इसका पता ही नहीं चला ।