बिन शिक्षक किस तरह का शिक्षक दिवस –आज भी कई स्कूल हैं इंतज़ार में।।

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आज शिक्षक दिवस है. शिक्षकों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जा रहा है. लेकिन सवाल उठता है कि पुरस्कार किस लिए. क्योंकि देशभर के स्कूलों की हालत तो कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. कहानी भी ऐसी की जो बड़े-बड़े पुरस्कारों पर ही उंगली उठा रही है. स्कूलों की ऐसी अनछुई कहानी की ओर इशारा कर रही है ।
अगर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी एक रिपोर्ट पर गौर करें तो कहीं स्कूल हैं तो टीचर नहीं है. जहां टीचर हैं तो वहां पढ़ने के लिए बच्चे नहीं हैं.   वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 5 से 17 वर्ष की उम्र के 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं.
राइट टू एजूकेशन एक्ट भी अपना असर नहीं दिखा सका. इस एक्ट के तहत 6 से 14 साल तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार है. लेकिन इस आयुवर्ग के 3.81 करोड़ बच्चे भी स्कूल से वंचित हैं. दूसरी तरफ देश में 97 हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और 10 हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी टीचर नहीं है.
सर्वशिक्षा अभियान के तहत देशभर में हर साल 20 से 25 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. राज्य सरकारों और मिड डे मील पर खर्च होने वाला बजट अलग से है।
मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर उत्तर प्रदेश के पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री रामगोविन्द्र चौधरी का कहना है कि देश में शिक्षकों की कमी है. शिक्षामित्रों को आपने सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया. एक शिक्षक 5-5 क्लास के बच्चों को पढ़ा रहा है. बच्चे स्कूल ही नहीं आ रहे हैं. जो हैं वो स्कूल छोड़कर जा रहे हैं. ऐसे में पुरस्कार देने की बात कहां से आ गई.।
जहाँ हर साल लाखों की मात्रा में लोग बीएड करके प्रशिक्षण ले कर अध्यापक की उपाधि ग्रहण कर रहे है और सरकार उनको यह कह कर सड़को पर आने को मजबूर कर रही हैं कि टीचर्स हमारे यहाँ सरप्लस है।
वहाँ यह भी समझ नही आता कि देश मे बीटीसी और बीएड कर लोग कई वर्षों से टीचर बनते आये हैं फिर टीचर की कमी कहा होगई की शिक्षामित्रों को स्कूलो में जगह देनी पड़ी। जिनको वोटबैंक के लिए सहायक अध्यापक बनाने का भी सरकार वादा कर गयी।
आज अगर सर राधाकृष्णन जीवित होते तो शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार और राजनीति देख शायद शिक्षक दिवस क्या अपना जन्मदिन भी नही मानते ।
कही शिक्षा के नाम पर शिक्षक खराब है तो कही राजनीति ने खराब कर रहा है ।
कही पढ़ाने के लिए टीचर नहीं हैं और पढ़ने के लिए बच्चे तो फिर किस बात का पुरस्कार दिया जा रहा है. हालांकि टीचर इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं है,

लेकिन जो टीचर है वो कम से कम ऐसा तो पढ़ाए कि बच्चे स्कूल आएं. बाकी तो व्यवस्था बनाने के नाम पर सरकार सिर्फ राजनीति कर रही है और उसे देश-प्रदेश से कोई मतलब नहीं है.
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (केब) के सदस्य ओम प्रकाश शर्मा का कहना है कि ये बात ठीक है कि जब हम समाज को कुछ देने की हालत में नहीं हैं.

बच्चे जैसे-तैसे पढ़ रहे हैं. टीचर, स्कूल और दूसरे संसाधन पूरी तरह से है नहीं इसके बाद भी हजारों करोड़ रुपये का बजट खर्च हो रहा है.

ऐसे में राष्ट्रपति और राज्यपाल पुरस्कार देने और लेने की बात समझ से परे है.

पहले हम बच्चों को इस लायक खड़ा करें कि वो खुद हमे अपने इनाम की तरह से लगें.
इसलिए पढ़ाने के लिए पहले एक ठोस नीति बनानी होगी.