Saturday, September 18, 2021

आस्था व भक्ति के साथ मां भगवती का हुआ स्थापना नवरात्रि के पहले दिन हुआ मां के पहले रुप शैलपुत्री का पूजन

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भदोही,ज्ञानपुर। रविवार को शारदीय नवरात्र का पहला दिन था। इस नवरात्र के मौके पर श्रद्धालुजनों के द्वारा मां भगवती के प्रथम स्वरूप् शैलपुत्री की पूजा मुहूर्त के अनुसार कलश स्थापन मूर्ति स्थापना करने के पश्चात हुई। जगह-जगह माता रानी के पूजा की धूम देखी गयी। बतादें कि नवरात्र के पहले दिन माता के पहले स्वरुप शैलपुत्री के पूजा को करने का विधान है। माता दुर्गा को शैलपुत्री इसलिए कहा जाता है कि वे हिमालय की पुत्री है। शैल का अर्थ पर्वत होता है हिमालय भी पर्वतो के राजा है इन्हें पर्वतराज कहा जाता है। इनका वाहन वृषभ है इसलिये इन देवी वृषभरूढा भी कहा जाता है। इन देवी के दायें हाथ में त्रिशूल तथा बायें हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा है। इन्हें सती के नाम से भी जाना जाता है। सती की कहानी लगभग सभी जानते ही है। नौ दुर्गा हिन्दू धर्म में माता दुर्गा या पार्वती के नौ रूपो को एक साथ कहा जाता है। इन नवो दुर्गा को पापो की विनाशिनी कहा जाता है। हर देवी के अलग-अलग वाहन है अस्त्र-शास्त्र है परंतु सब एक है। देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। दुर्गाजी पहले स्वरूप में ’शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ’शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ’मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।दुर्गा के पहले स्वरूप में शैलपुत्री मानव के मन पर अधिपत्य रखती हैं। उन्होंने बताया कि चंद्रमा पर आधिपत्य रखने वाली शैलपुत्री जीव की उस नवजात शिशु की अवस्था को संबोधित करतीं हैं जो अबोध, निष्पाप व निर्मल है। देवी शैलपुत्री मूलतः महादेव कि अर्धांगिनी पार्वती ही है। देवी पार्वती पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं तथा उस जन्म में भी वे महादेव की ही पत्नी थीं। सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में, महादेव का अपमान न सह पाने के कारण, स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर दिया था तथा हिमनरेश हिमावन के घर पार्वती बन कर अवतरित हुईं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ’शैलपुत्री’ पड़ा। देवी शैलपुत्री का वर्ण चंद्र के समान है, इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट में अर्धचंद्र अपनी शोभा बढ़ाता है। ये वृष अर्थात बैल पर सवार हैं अतः इन्हें देवी वृषारूढ़ा भी कहते हैं। इन्होने दाहिने हाथ में त्रिशूल व बाएं हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। देवी शैलपुत्री की साधना का संबंध चंद्रमा से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में चंद्रमा का संबंध चौथे भाव से होता है अतः देवी शैलपुत्री कि साधना का संबंध व्यक्ति के सुख, सुविधा, माता, निवास स्थान, पैतृक संपत्ति, वाहन, जायदाद तथा चल-अचल संपत्ति से है। मां शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। इसके साथ ही मनपसंद वर-वधू, धन लाभ और अच्छी नौकरी की प्राप्ति होती है। वास्तुपुरुष सिद्धांत के अनुसार देवी शैलपुत्री कि साधना का संबंध इंदु से है, इनकी दिशा पश्चिमोत्तर है। पंचमहाभूतों कि श्रेणी में इनका आधिपत्य जल स्रोत पर है अतः निवास में बने वो स्थान जहां शुद्ध चलायमान पानी को एकत्रित करते है। इनकी साधना से मनोविकार दूर होते है। इनकी साधना चंद्रोदय के समय श्वे़त पुष्पों से करनी चाहिए। श्रृंगार में इन्हें चंदन प्रिय है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री के मंत्र ओम् शं शैलपुत्री देव्यैः नमः का जाप करना चाहिए। इससे व्यक्ति को मन की शांति मिलेतीऔर जीवन के सभी दुख दूर हो जाता है। माता का ये पाठ मनुष्य जीवन को खुशियों से भर देती है।

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