Friday, July 23, 2021

नाग पंचमी : दुर्लभ रवि और शिव योग बना रहा विशेष संयोग, जानिये क्या करें और क्या नहीं

पुलिस अधीक्षक द्वारा की गयी मासिक अपराध गोष्ठी में अपराधों की समीक्षा व रोकथाम हेतु दिये गये आवश्यक दिशा-निर्देश

Maharajganj: पुलिस अधीक्षक महराजगंज प्रदीप गुप्ता द्वारा आज दिनांक 17.07.2021 को पुलिस लाइन्स स्थित सभागार में मासिक अपराध गोष्ठी में कानून-व्यवस्था की...

शायर मुनव्वर राना के बोल, ‘दोबारा सीएम बने योगी तो यूपी छोड़ दूंगा’

लखनऊ: मशहूर शायर मुनव्वर राना एक बार फिर अपने बयान की वजह से सुर्खियों में हैं।उन्होंने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा...

Maharajganj: CO सुनील दत्त दूबे द्वारा कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस महानिदेशक जोन गोरखपुर ने प्रशस्ति पत्र से नवाजा।

Maharajganj/Farenda: सीओ फरेन्दा सुनील दत्त दूबे को थाना पुरन्दरपुर में नवीन बीट प्रणाली के क्रियान्वयन में कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस...

विधायक विनय शंकर तिवारी किडनी की बीमारी से पीड़ित ग़रीब युवा के लिए बने मसीहा…

हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से किडनी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मदद हेतु युवाओं के द्वारा अपील की...

महराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतर्गत SBI कृषि विकास शाखा के सामने से मोटरसाइकिल चोरी

Maharajganj: महाराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतगर्त मंगलवार को बृजमनगंज रोड पर भारतीय स्टेट बैंक कृषि विकास शाखा के ठीक...

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इस वर्ष श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि पर 25 जुलाई को नागपंचमी का पर्व रवियोग और शिवयोग में मनाया जाएगा। श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि शनिवार को पड़ने से रवि योग बन रहा है। रवि योग में नागपंचमी ऋण मुक्ति और स्वास्थ्य के लिए विशेष शुभ है। नागपंचमी उत्तरा फाल्गुनी और हस्त नक्षत्र के प्रथम चरण में पड़ रही है। इस संयोग से शिव योग बन रहा है, जो नाग पूजन के लिए दुर्लभ माना गया है। नागपंचमी पर नाग पूजन का शुभ मुहूर्त दोपहर दो बजकर 19 मिनट से सूर्यास्त तक है। हालांकि पंचमी की तिथि 26 जुलाई की दोपहर 12 बजकर 37 मिनट तक रहेगी।

कालसर्प योग के जातकों के लिए नागपंचमी के दिन काशी के नागकूप पर पूजा विशेष फलदायी मानी गई है, लेकिन इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण ऐसा संभव नहीं हो सकेगा। श्रद्धालु  नागदेवता के दर्शन भी नहीं कर पाएंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देव हैं। भृगु संहिता विशेषज्ञ पं. वेदमूर्ति शास्त्री के अनुसार नाग पूजन का विधान गरुड़ पुराण में विस्तृत रूप से वर्णित है। नागपंचमी को घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर नाग का चित्र बनाकर अनंत आदि नौ नामों वाले नागों का पूजन करना चाहिए। सर्पदंश से सुरक्षित रहने के लिए नागपंचमी के दिन उनकी वामी पर दूध चढ़ाएं एवं चांदी या सोने या मिट्‌टी का नाग बनाकर हल्दी, चंदन, धूप पंचामृत, नैवेद्य आदि से नागों की पूजा करें। 

इस दिन नहीं खोदनी चाहिए भूमि
पंचमी को नागपूजा करने वाले व्यक्ति को इस दिन भूमि नहीं खोदनी चाहिए। पूजन के बाद सर्प देवता की आरती उतारें, कच्चे दूध में शहद, चीनी या थोड़ा सा गुड़ मिलाकर सांप की वामी या बिल में डाल दें। उस बिल की मिट्‌टी से चक्की, चूल्हे, दरवाजे के निकट दीवार, घर के कोनों में सांप बनाएं। भीगे हुए बाजरा, घी और गुड़ से इनकी पूजा करें। ऐसा करने से घर में सांप के भय से मुक्ति प्राप्त होती है।

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नाग पंचमी के दिन करें यह पांच उपाय 
भगवान शिव का अभिषेक करते समय चांदी के नाग और नागिन का जोड़ा चढ़ाएं
इस दिन किसी सपेरे से नाग नागिन का जोड़ा खरीदकर उसे जंगल में मुक्त करवाएं
नाग स्तोत्र का 108 बार पाठ करें और अपने वजन के बराबर कोयला पानी में बहाएं
पीपल के पेड़ के नीचे दूध रखें और प्रवाहमान जल में 11 नारियल प्रवाहित करें
शिवजी को विजया, अर्क पुष्प, धतूर पुष्प, फल चढ़ाएं तथा दूध से रुद्राभिषेक करवाएं

ऑनलाइन होगा शास्त्रार्थ
काशी में नागपंचमी को नागकूप पर होने वाले शास्त्रार्थ की सदियों पुरानी परंपरा का इस वर्ष ऑनलाइन निर्वहन होगा। कोरोना संक्रमण के चलते ऐसा पहली बार होगा। नागकूप का संबंध महर्षि पतंजलि से है। ऐसी मान्यता है कि यहां श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि पर शास्त्रार्थ करने से वाणी पवित्र होती है और मेधा शक्ति का विकास होता है। 25 जुलाई को प्रातः नागकूपेश्वर महादेव का पांच वैयाकरण विद्वान पाणिनी अष्टाध्यायी से विल्वार्चन करेंगे। यह अनुष्ठान श्रीविद्यामठ के प्रभारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती के सानिध्य में होगा। इसके बाद नागकूप शास्त्रार्थ समिति की ओर से राष्ट्रीय वेबिनार होगा। वेबिनार में शास्त्रार्थ, शोधपत्र वाचन और व्याकरण शास्त्र पर चर्चा की जाएगी। प्रतिवर्ष इस अनुष्ठान में सैकड़ो संस्कृतसेवी उपस्थित होते हैं। देश के कोने कोने के विद्वान नागपंचमी पर नागकूप में शोधपत्रों का वाचन करते हैं। 

ऑनलाइन शास्त्रार्थ के लिए विषयवार निर्णायक मंडल का गठन हो चुका है। व्याकरण, वेदांत, मीमांसा, ज्योतिष, साहित्य, न्याय, दर्शन विषय के लिए प्रो. भगवत शरण शुक्ल, प्रो. ब्रजभूषण ओझा, डा दिव्यचैतन्य ब्रह्मचारी, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. धनंजय पाण्डेय, प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, प्रो. शंकर मिश्र, प्रो. विनय पाण्डेय, प्रो अमित शुक्ल, प्रो. शिवजी उपाध्याय, प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. सच्चिदानन्द मिश्र को निर्णायक बनाया गया है। शास्त्रार्थ सत्र की अध्यक्षता अन्नपूर्णा मंदिर के महंत रामेश्वर पुरी करेंगे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्विवद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल मुख्य अतिथि तथा महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय उज्जैन के पूर्व कुलपति प्रो. आरसी पण्डा विशिष्ट अतिथि होंगे जबकि गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. अर्कनाथ चौधरी मुख्य वक्ता होंगे। इस सत्र में सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गोपबंधु शुक्ल का विशिष्ट व्याख्यान होगा। शोध संगोष्ठी सत्र की अध्यक्षता लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली के कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडेय करेंगे।

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26 वर्ष पूर्व आयोजन को मिला राष्ट्रीय स्वरूप
काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष महामहोपाध्याय पं. रामयत्न शुक्ल ने वर्ष-1995 में नागकूप शास्त्रार्थ समिति का गठन कर इस आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। देश के ख्यातिलब्ध विद्वान और विद्यार्थी यहां शास्त्रार्थ के लिए आने लगे। संस्कृत की सेवा करने वाले देश के पांच विद्वानों को प्रति वर्ष सम्मानित भी किया जाता है मगर इस वर्ष सम्मान समारोह स्थगित रहेगा। अगले वर्ष दस विद्वानों को एक साथ सम्मानित किया जाएगा। नागकूप शास्त्रार्थ समिति काशी में प्रतिमास शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को मठों, संस्कृत विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शास्त्रार्थ सभा कराती है। शास्त्रार्थ में विजयी होने वाले विद्वानों और छात्रों को सम्मानित किया जाता है।

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महर्षि पतंजलि भूत बनकर देते थे व्याकरण की शिक्षा
समिति के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार मान्यता है कि महर्षि पतंजलि ने व्याकरण शास्त्र के अद्वितीय ग्रंथ महाभाष्य की रचना इसी स्थान पर की थी। वह शरीर त्यागने के बाद भूत के रूप में व्याकरण की शिक्षा दिया करते थे। इसका प्रमाण आचार्य नागेश भट्ट की आत्मकथा में मिलता है। उन्होंने लिखा है कि महर्षि पतंजलि ने उनके सामने शर्त रखी थी कि जिस दिन वह यह भेद खोल देंगे, उसी दिन से वह शिक्षा देना बंद कर देंगे। शिक्षा का यह क्रम कई वर्षों तक चला। एक बार नागपंचमी के दिन ही शास्त्रार्थ के दौरान नागेश भट्ट के कुछ तर्कों को विद्वान मानने के लिए तैयार नहीं थे। अंतत: नागेश भट्ट ने भेद खोल दिया। उसके बाद से नागेश भट्ट को महर्षि के दर्शन नहीं हुए।

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