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Friday, June 5, 2020

कोरोनावायरस” क्या हम सब है जिम्मेदार ?

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Gorakhpur Times | गोरखपुर टाइम्स

जिंदगी और मौत की लड़ाई सदियों से चली आ रही है | इंसान की ख्वाहिस लम्बी अवधि तक जिंदा रहने की रही है | जबकि मौत के कई रूप सामने आते रहा है, जिसमे इंसान की विभिन्न बातों जैसे उम्र, दायित्व, आवश्यकता को दारनिकार कर, मौत लोगों को अपने आगोस मे लेती रही है | स्थिति तब चिंता जनक होती है जबकि बड़े समूह को आकस्मिक मौत अपने अगोस मे लेने के लिए दोनों हाथ फैलाये खड़ी हो | जिसे हम महामारी के नाम से भी जानतें है | जिसके सामने संसार मे उपलब्ध बेहतर से बेहतर डाक्टर भी कुछ समय के लिए हार स्वीकार करने के लिए विवश होतें है | जब तक उस पर इंसान विजय पाता है तब तक लाखों लोग अपनी जिंदगी गवां चूके होतें है | औसतन एक सदी व्यतीत होने के उपरांत बड़ी महामारी ने विश्वभर मे हमेशा अपनी दस्तक देकर और अनमोल जिंदगी को खत्म किया है | तो क्या इंसान जो आज चंद्रमा तक पहुँच चुका है | जिसकी प्रद्योगिकी ने जिंदगी की कई आवश्यकताओं को समय की सीमा मे बाध दिया है | यहा तक की जन्म का निर्धारण भी स्वयं मे करने लगा है | आधुनिक इंसान किसी एक शक्ति के सामने इतना विवश है और इस तरह विवश है की उसे घरों मे कैद रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा ? इंसान की ऐसी कौन सी भूल है जो उस पर कल भी भारी थी आज भी भारी है और शायद आगे भी भारी पड़ेगी ? या प्राकृतिक की अपनी साइकिल है, किसी व्यवस्था को साधारण बनाने की ?

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आप अपने उम्र के पिछले इतिहास मे जायेगे तो आपको स्वतः ही यह संज्ञान होगा की इंसान ने सबसे अधिक छेड़छाड़ प्रकृति और इस धरती पर उपलब्ध अन्य जीवों के साथ किया है | जहां इंसान और इंसान की जरूरतों के अलावा किसी की न आवश्यकता है और न महत्व | अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए कृत्रिम वायु से लेकर कृत्रिम इंसान तक लोगों ने बना रखें है | अपने स्वाद के लिए अनाज से ऊपर उठ कर पशु पक्षी जानवर कीड़े मकोड़ों की प्रजाति के आगे बढ़कर इंसान और इंसानी बच्चों को खाने तक का विकास किया है | जबकि इस धरती पर सभी का समान अधिकार है, चाहे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म कीड़े मकोड़े ही क्यों न हो | सबके रहने के घरों और स्थानों को खत्म करने का ही नतीजा है की वो लोग अपना जीवन बचाने आपके घर तक आ रहें है, और परिणाम स्वरूप उन्हे मिलता है तो मौत | इतना कुछ करने के पश्चात प्रकृति आज भी इंसानों का साथ दे रही है | फिर चाहे धूप हो छाव हो हवा हो खाने की या उपभोग की जरूरते हो |

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दुर्भाग्यपूर्ण यह नहीं है की कोरोनावायरस से विश्वभर मे हाहाकार मचा हुआ है | दुर्भाग्यपूर्ण यह नहीं की लाखों लोग इस वायरस से संक्रमित है | दुर्भाग्यपूर्ण यह नहीं की अर्थव्ययस्थ अपने निम्न पैदान पर रहेगी | दुर्भाग्यपूर्ण यह भी नहीं की करोड़ों लोगों को परेशनिया उठानी पड़ रही है | बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण यह है की यह कोरोनावायरस जहां से शुरू हुआ उसका वास्तविक कारण आज तक लोगों को नहीं पता | दुर्भाग्यपूर्ण यह है की चीन से शुरू यह बीमारी विश्वभर मे कैसे फैल गयी | दुर्भाग्यपूर्ण यह है की विकसित देश भी अपने लोगों को स्वास्थ रक्षा की जरूरतें क्यों नहीं पूर्ण कर पा रहें है | दुर्भाग्यपूर्ण यह है की विश्वभर के श्रेष्ठतम डाक्टर्स और रिसर्च एजेंसियां इसका तोड़ अभी तक नहीं खोज पायी है |

इतिहास मे इस बात के ढेरों प्रमाण मौजूद है की इस तरह की महामारी पर देर-सबेर इंसान ने विजय अवश्य पायी है | शायद यही सुकून और आत्मविश्वास की बात है की आज नहीं तो कल हम इस वायरस पर भी विजय पा लेगे | इस परिस्थिति मे भी यही सच्चाई सामने आती है की इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन इंसान है जो अपने विकास और लालच की पूर्ति मे जीवन के महत्व को भूल गया है | उसका उद्देश्य सिर्फ अपने स्वार्थ को पूरा करना रह गया है | प्रकृति के ऊपर लाखों जख्मों होने के बावजूद जीवन को ही प्यार करती है | और सभी को समान रूप मे सहयोग कर रही है | कुछ लोग आध्यात्म, तो कुछ लोग मजहब धर्म, कुछ लोग विज्ञान को, कुछ लोग सत्ताधारी लोगों को, इस महामारी के लिए जिम्मेदार मान सकतें है | किन्तु जब जीवन को बचाने की बारी आती है तो, हम तुच्छ लाभ मे जुड़ जातें है, फिर चाहे बड़े स्तर की बात हो या फिर छोटे स्तर की | इस महामारी पर तो हम विजय अवश्य पा लेगे, किन्तु इस तरह की अन्य या इससे भी भयावह आने वाली महामारी के लिए हम सब क्या वास्तव मे तैयार है | सोचिएगा जरूर..

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लेख- Dr. Ajay Kumar Mishra(Lucknow)

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