Monday, September 21, 2020

कोरोना काल मे गिरती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी…..

बिग ब्रेकिंग:- सुबह-सुबह महाराष्ट्र में मौत का तांडव,तीन मंजिला बिल्डिंग गिरने से 10 की मौत,और लोगों को बचाने की कोशिश

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अर्थव्यवस्था में आई मंदी सिर्फ जीडीपी के सिकुड़ने का एक स्वरूप भर मात्र नहीं है। सही मायने में यह बीते कई वर्षों में अर्जित आर्थिक विकास के सिकुड़ने का एक क्रम भी है। इसमें वर्षों की लंबी लड़ाई के बाद गरीबी से बाहर निकाली गई आबादी, बड़े स्तर पर रोजगार सृजन, प्रति व्यक्ति आय दर में वृद्धि, लोगों के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर में सुधार आदि में अर्जित सफलता के एक निराशा में बदल जाने की प्रबल संभावना है। कोविड-19 के दौरान चल रही भीषण मंदी भी भारतीय अर्थव्यवस्था को रोजगार, गरीबी, आय जैसे महत्वपूर्ण आयामों पर काफी पीछे ले जा सकती है।

आर्थिक मंदी सिर्फ हमें कमजोर नहीं करती बल्कि ज्यादा भयावह इसलिए हो जाती है क्योंकि यह में एक नए मोड़ पर ले जाकर छोड़ देती है। कोविड-19 वह मंदी है जो एक अनिश्चित मोड़ पर ले जाकर हमें खड़ा कर देगी। एक भयंकर बेरोजगारी की समस्या निकट भविष्य में आने वाली है, और यही बेरोजगारी की समस्या भविष्य में गरीबी और आय असमानता की गंभीर समस्या को पैदा करेगी।

वर्तमान में रोजगार की तीन श्रेणियां इस पूरे संकट में बनती दिख रही हैं।

1- पहली श्रेणी उन लोगों की है, जिनका रोजगार हमेशा के लिए छिन जाएगा।
2- दूसरी पीढ़ी उन लोगों की है, जो मंदी की वजह से अपने पुराने काम पर वापस लौट जाएंगे और उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार रोजगार प्राप्त हो जाएगा।
3- तीसरी श्रेणी उन लोगों की है, जो नए उद्योगों और देश की सरकारों के भरोसे रोजगार की आस में देख रहे हैं।

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कोविड-19 की गंभीर महामारी से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन ने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की समस्या को और बढ़ा दिया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल के पहले हफ्ते में बेरोजगारी दर 23 फ़ीसदी पहुंच गई थी। तकरीबन 12 करोड़ नौकरियों के जाने की बात कही गई थी। उस दौरान देश में कुल 40.4 करोड रोजगार उपलब्ध थी, जिनमें से 8.12 करोड़ रोजगार वेतन भोगी थे। बाकी बचे 32 करोड़ रोजगार वे थे जो दैनिक मजदूरी या स्वरोजगार में थे।

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लेकिन भारत में यह बेकारी की समस्या महज कोविड-19 की वजह से ही नहीं आई है। बल्कि यह पहले से ही चल रही थी। एनएसएसओ के मुताबिक वर्ष 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी थी, यानी 45 साल की सबसे उच्चतम स्तर पर। इस समस्या की गंभीरता को इस तथ्य के साथ समझा जा सकता है कि बीते वर्षों में बेरोजगारी और वृद्धि दर लगभग बराबर रही है। वर्ष 2014 से 2019 के बीच आर्थिक वृद्धि कर जहां औसतन 7 फ़ीसदी के आस-पास रही, वहीं बेकारी दर भी औसतन 6 फ़ीसदी से अधिक रही है और फिर कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की दर में बेतहाशा वृद्धि की है।

एक बड़े पैमाने पर रोजगार गए हैं और नए रोजगारों को लेकर भी अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बनी हुई है। जिन लोगों के सबसे अधिक रोजगार गए हैं वह भारतीय अर्थव्यवस्था का मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास और दैनिक मजदूरी वाला वर्ग है। असल मायने में एक गंभीर आर्थिक एवं सामाजिक खतरा इन तीनों ही वर्गों में व्याप्त है। जारी आर्थिक मंदी इन तीनों ही वर्गों को कमजोर करेगी और जो वर्तमान मिडिल क्लास है, वह कल लोअर मिडिल क्लास होगा और आज का लोअर मिडिल क्लास शिफ्ट होकर गरीबी रेखा के नीचे चला जाएगा। दैनिक मजदूरी करने वाली आबादी पहले से कहीं और अधिक कमजोर होगी। इस तरीके से भारतीय अर्थव्यवस्था में एक सिकुड़न देखी जाएगी। हाल ही में आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य का जिक्र भी किया था कि भारत का मिडिल क्लास सिकुड़ रहा है। इसी बीच कोविड-19 की रोकथाम के लिए लगाए गए लॉकडाउन ने इसकी रफ्तार को और तेज कर दिया है।

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ऐसी परिस्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था एक नए दुष्चक्र को देखने वाली है। तेजी से रोजगार खत्म हो रहे हैं और नई नौकरियां इतनी आसानी से नहीं आने वाली है। सबसे अधिक रोजगार भारत के उभरते आर्थिक क्षेत्रों में गए। जैसे ओला, उबर, जोमैटो जैसे नए स्टार्टअप, होटल, पर्यटन, विमानन उद्योग, ऑटो और ऑटो पार्ट्स, एमएसएमई क्षेत्र, रियल स्टेट, कपड़ा उद्योग आदि। लोगों को नौकरियों से निकालने का इरादा इन कंपनियों का नहीं था, लेकिन कंपनियां यह सब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कर रही है। आज कंपनियों का बैलेंस शीट पूर्व की भांति नए रोजगार सृजन पैदा करने की वकालत करता नहीं दिखता है।

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अर्थव्यवस्था में घटते रोजगार के अवसरों से अब लोगों की आय में कमी आएगी। ऐसी परिस्थिति में एक निश्चित वक्त तक ही लोग अपनी बचत के आधार पर खपत कर पाएंगे। उसके बाद बचत दर में भी कमी देखी जाएगी। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस संकट के पहले से ही बचत दर अप्रत्याशित रूप से घट रही थी। इन सब के परिणाम स्वरूप अर्थव्यवस्था में मांग घटेगी और निवेश में भारी कमी देखी जाएगी। नौकरियां कम होंगी और बाजार सिकुड़ जाएगा। बेरोजगारी की मारी भारतीय अर्थव्यवस्था गरीबी, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी की एक नए दुष्चक्र में समा जाएगी।

लेखक- विक्रांत सिंह
संस्थापक एवं अध्यक्ष
फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स थिंक काउंसिल
काशी हिंदू विश्वविद्यालय।

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