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Monday, June 1, 2020

क्रांतिकारियों की शहादत और गौरव-गाथा को समेटे है यहां का ‘घंटाघर’…

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Gorakhpur Times | गोरखपुर टाइम्स

 शहर के व्यस्ततम उर्दू बाजार में खड़ी मीनार सरीखी इमारत घंटाघर क्रांतिकारियों की शहादत और उनकी गौरव-गाथा को समेटे हुए है।

गोरखपुर शहर के व्यस्ततम उर्दू बाजार में खड़ी मीनार सरीखी इमारत घंटाघर क्रांतिकारियों की शहादत और उनकी गौरव-गाथा को समेटे हुए है। जहां यह घंटाघर है, 1857 में वहां एक विशाल पाकड़ का पेड़ हुआ करता था। इसी पेड़ पर पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अली हसन जैसे देशभक्तों के साथ दर्जनों स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई थी।

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1930 में रायगंज के सेठ राम खेलावन और सेठ ठाकुर प्रसाद ने पिता सेठ चिगान साहू की याद में इसी स्थान पर एक मीनार सरीखी ऊंची इमारत का निर्माण कराया, जो शहीदों को समर्पित थी। सेठ चिगान के नाम पर काफी दिनों तक इस इमारत को चिगान टॉवर भी कहा जाता रहा। टॉवर पर एक घंटे वाली घड़ी लगाई गई, जिसकी वजह से बाद में यह टॉवर घंटाघर के नाम से मशहूर हो गया। घंटाघर के निर्माण की कहानी आज भी हिंदी और उर्दू भाषा में उसकी दीवारों पर अंकित है।

घंटाघर की दो दीवारों पर हिंदी और उर्दू में लिखा हुआ है ‘सेठ राम खेलावन साहब, ठाकुर प्रसाद साहब, मोहल्ला रायगंज, शहर गोरखपुर ने अपने पूज्य पिता श्रीमान सेठ चिगान साहू की स्मृति में यह चिगान टॉवर, ठाकुर सुखदेव प्रसाद वकील गोरखपुर के अनुग्रह से निर्माण कराकर विंध्यवासिनी प्रसाद वकील और चेयरमैन गोरखपुर को सन् 1930 में समर्पित किया।’ घंटाघर की दीवार पर लगी महान क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की तस्वीर इसे बिस्मिल से जोड़ती है।

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यहीं रुकी थी बिस्मिल की शवयात्रा

दरअसल 19 दिसंबर 1927 में जब जिला कारागार में बिस्मिल को फांसी दी गई तो शहर में निकली उनकी शवयात्रा इसी घंटाघर पर आकर रुकी थी। यहां पर कुछ देर के लिए उनका शव रखा गया था और उसी दौरान बिस्मिल की माता ने यहां पर एक प्रेरणादायी भाषण भी दिया था। उसके बाद से इस स्थल से बिस्मिल की ऐसी यादें जुड़ी, जिसे न तो शहरवासी अब तक भूल सके हैं और न कभी भूल पाएंगे।

दास्तान-ए-मोहल्ला : रिश्ते में भाई हैं मोहल्ला जगन्नापुर और रमदत्तपुर

कम ही लोगों को पता होगा कि गोरखपुर शहर के दो घने मोहल्ले जगन्नाथपुर और रमदत्तपुर रिश्ते में भाई हैं। कहने का सीधा मतलब इन्हें दो भाइयों ने बसाया है, जगन्नाथ सिंह और राजा रामदत्त सिंह ने। बात उन दिनों की है जब मुगल सम्राट जहांगीर के शासन काल के दौरान मुगलों का शासन गोरखपुर में एकबारगी कमजोर पडऩे लगा था। उस समय गोरखपुर मुगलों के अवध क्षेत्र का हिस्सा था। शासन कमजोर पड़ता देख सतासी के राजा रुद्र सिंह ने गोरखपुर पर कब्जा कर लिया।

उसके बाद सतासी इस्टेट के 90 वर्ष के शासनकाल के दौरान उनके जागीरदारों ने गोरखपुर में शासन व्यवस्था तो दुरुस्त की ही, साथ ही शहर को बसाया भी। इसी क्रम में बसा मोहल्ला जगन्नाथपुर और रामदत्तपुर (वर्तमान में रमदत्तपुर), इन दोनों मोहल्लों के संस्थापक सतासी राज्य के जागीरदार थे। राजा रुद्र सिंह ने जब उन्हें गोरखपुर की शासन व्यवस्था नियंत्रित करने के लिए भेजा तो जगन्नाथ सिंह ने राप्ती नदी के किनारे जगन्नाथपुर तो रामदत्त सिंह ने रोहिणी नदी के किनारे रमदत्तपुर के इलाके की जिम्मेदारी संभाली।

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राजस्‍व रिकार्ड में दर्ज है नाम

जब दोनों इलाकों की व्यवस्था दुरुस्त हो गई तो सुरक्षित स्थान देख लोगों ने वहां बसना शुरू कर दिया। दोनों जागीरदारों ने इसे लेकर लोगों का सहयोग भी खूब किया। धीरे-धीरे दोनों जागीरदारों के नाम पर इलाके को पहचान मिलने लगी और बाद में उनके नाम से ही मोहल्ले को स्थापित नाम मिल गया, जो आज राजस्व रिकार्ड में भी दर्ज है। दोनों मोहल्लों के इस इतिहास का जिक्र किसी न किसी रूप में डॉ. राजबली पांडेय की किताब ‘गोरखपुर में क्षत्रीय जातियों का इतिहास’ और पीके लाहिड़ी और डॉ. केके पांडेय की किताब ‘आइने गोरखपुर’ में मिलता है। अहमद अली शाह ने भी अपनी किताब ‘महबूबुल-उल-तवारीफ’ में इन दोनों मोहल्लों और उनके बसाए जाने की परिस्थितियों की चर्चा करते हुए उन्हें जमींदार जगन्नाथ सिंह और रामदत्त सिंह से जोड़ा है।

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