Friday, September 17, 2021

क्रांतिकारी बिस्मिल के बलिदान स्थली गोरखपुर जेल में मनाई गई उनकी 123वी जयंती…..

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अखिल भारतीय क्रांतिकारी संघर्ष मोर्चा एवं गुरुकृपा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में गोरखपुर के ऐतिहासिक बलिदान स्थल मण्डलीय कारागार पर पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की 123वीं जयंती मनायी गयी।कोविड-19 के सुरक्षा को ध्यान में रखकर एवं सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए नगर निगम गोरखपुर प्रशासन द्वारा सेनीटाइज किया गया और संस्था के अध्यक्ष बृजेश राम त्रिपाठी के द्वारा मूर्ति की साफ-सफाई की गई और उनकी जयंती के पूर्व संध्या पर बिस्मिल कक्ष में दीप जलाकर आरती किया गया कार्यक्रम को अति संक्षेप में मनाया गया।

संगठन प्रमुख श्री त्रिपाठी ने कहा कि क्रांति की प्रेरणास्थल है गोरखपुर जेल, आजादी की देवी यहीं से होकर गुजरती हैं।राम और अज्ञात के नाम से विख्यात ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर जेल पहुंचीं उनकी मां ने डबडबाई आंखें देखकर उनसे पूछा था, ‘तुझे रोकर ही फांसी चढ़ना था तो क्रांति की राह क्यों चुनी?’
1897 में आज के ही दिन यानी 11 जून को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में माता मूलारानी और पिता मुरलीधर के पुत्र के रूप में जन्मे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में आज की तारीख में यह तो सर्वज्ञात है कि अंग्रेजों ने ऐतिहासिक काकोरी कांड में मुकदमे के नाटक के बाद 19 दिसंबर, 1927 को उन्हें गोरखपुर की जेल में फांसी पर चढ़ा दिया था, लेकिन बहुत कम ही लोग जानते हैं कि इस सरफरोश क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व में संवेदशील कवि, शायर, साहित्यकार व इतिहासकार के साथ एक बहुभाषाभाषी अनुवादक का भी निवास था और लेखन या कविकर्म के लिए उसके ‘बिस्मिल’ के अलावा दो और उपनाम थे- ‘राम’ और ‘अज्ञात’.
इतना ही नहीं, 30 साल के जीवनकाल में उसकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं और सारी की सारी जब्त कर ली गयीं. हां, इस लिहाज से वह भारत तो क्या, संभवतः दुनिया का पहला ऐसा क्रांतिकारी थे, जिन्होंने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे।।इतिहास के जानकार के मुताबिक, ‘बिस्मिल’ के क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 1913 में अपने समय के आर्य समाज और वैदिक धर्म के प्रमुख प्रचारकों में से एक भाई परमानंद , जो कि अमेरिका स्थित कैलीफोर्निया में अपने बचपन के मित्र लाला हरदयाल की ऐतिहासिक गदर पार्टी में सक्रियता के बाद हाल ही में स्वदेश लौटे थे, गिरफ्तार कर प्रसिद्ध गदर षड्यंत्र मामले में फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद हुई।।परमानंद भाई को सुनाई गई इस क्रूर सजा से उद्वेलित राम प्रसाद बिस्मिल ने ‘मेरा जन्म’ शीर्षक से कविता तो रची ही, साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य के समूल विनाश की प्रतिज्ञा कर I WISH DOWN FALL OF THE BRITISH UMPAIRE क्रांतिकारी बनने का फैसला कर लिया तो इसके लिए जरूरी हथियार अपनी पुस्तकों की बिक्री से प्राप्त रुपयों से ही खरीदे थे।
इस अवसर पर सत्यजीत सिंह, सुशील शुक्ला, हृदयेश तिवारी, रामानंद, मनीष, शिव नारायण उपस्थित थे।

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