Tuesday, September 28, 2021

गुरु गोरखनाथ और गौशाला की गायों से सीएम योगी का क्या है संबंध?

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वेद-पुराणों को खंगालें तो योगी गोरखनाथ का ज़िक्र हर युग में मिलता है. कलयुग में संत कबीर के साथ. द्वापर में पांडवों के साथ. त्रेता में भगवान राम के साथ और सतयुग में महादेव शिव के साथ भी.

पता चलता है कि ये सब कुछ सिर्फ किस्से-कहानियां नहीं, बल्कि बाबा गोरखनाथ के धाम में इन कहानियों से जुड़े कई सबूत आज भी दिखाई देते हैं. हम आपको वे कहानियां भी दिखाएंगे, लेकिन उससे पहले ये देखना जरूरी है कि आखिर योगी मत्येन्द्रनाथ और योगी गोरखनाथ के बीच रिश्ता क्या है.

दो चमत्कारी महायोगियों की कहानी भी एक बहुत बड़े चमत्कार से शुरू हुई थी. गुरु गोरखनाथ को शिव का अवतार माना जाता है और ये माना जाता है कि गोरखनाथ ने किसा मनुष्य की कोख से जन्म नहीं लिया. गोरखनाथ एक अजूबे की तरह खुद पैदा हुए और कैसे इसके पीछे एक अजीबोगरीब कहानी है? एक किवदंती के मुताबिक योगी मत्येन्द्रनाथ भिक्षा मांगने एक गांव की ओर निकले थे. योगी ने आवाज लगाई, तो एक महिला घर से बाहर निकली. महिला ने योगी मत्येन्द्रनाथ को अनाज दिया और बदले में पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मांगा.

योगी मत्येन्द्रनाथ उस महिला को चुटकीभर भभूत देकर आगे निकल गए लेकिन कुछ सहेलियों ने महिला का मज़ाक उड़ाना शुरु कर दिया. लोगों के डर से उस महिला को योगी की भभूत को पास के ही गौशाला में फेंक दिया. इस कहानी के मुताबिक 12 साल बाद योगी मत्येन्द्रनाथ दोबारा उसी गांव में पहुंचे. सबकुछ वैसा ही था. उस महिला को देखकर योगी मत्येन्द्रनाथ को 12 साल पुरानी कहानी याद गई. मत्येन्द्रनाथ ने महिला से उस पुत्र के बारे में पूछा लेकिन महिला ने बताया कि लोगों के डर से उसने भभूत को गौशाला में फेंक दिया था.

योगी मत्येन्द्रनाथ अपनी शक्तियों से सबकुछ जान चुके थे, इसलिए वो गौशाला की तरफ बढ़े और एक बालक को आवाज लगाई. 12 बरस का एक बच्चा योगी मत्येन्द्रनाथ के सामने आ गया. योगी मत्येन्द्रनाथ ने उस बच्चे को नाम दिया गोरक्षनाथ जो आगे चलकर योगी गोरखनाथ कहलाए. हालांकि गोरक्ष नाम को लेकर विद्वानों की अलग अलग राय है. कुछ जानकार मानते हैं कि गोरक्ष का मतलब गाय की रक्षा से था क्योंकि बाबा गोरखनाथ गौशाला में अवतरित हुए थे तो कुछ जानकार गोरक्ष को धरती से जोड़ते हैं क्योंकि शिव के नौ-नाथ की कहानी धरती की रक्षा से जुड़ी है.

धाम के लोगों का कहना है कि ‘नाथ परम्परा में ये माना जाता है कि गोरखनाथ जी का जन्म किसी मां के गर्भ से नहीं हुआ था इसलिए वो अवतारी पुरुष हैं और जो अवतारी पुरुष होते हैं वो अजर और अमर होते हैं उनका कोई काल खंड नहीं होता है.’

योगी गोरखनाथ और मत्येन्द्रनाथ का जन्म कब हुआ, इस पर विद्वानों में लंबा मतभेद चला आया है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी देशभर में घूमकर बाबा गोरखनाथ से जुड़ी जानकारियां जुटाई थीं और अंदाजा लगाया था कि उनका जन्मकाल 845 ईस्वी से 13वीं सदी में हुआ होगा लेकिन वेदों और पुराणों में लिखी कहानियां ये कहती हैं कि बाबा गोरखनाथ आज भी इसी धरती पर हैं और अलग अलग रुपों में महादेव का अंश बनकर मौजूद हैं.

इन दावों पर यक़ीन करना जितना मुश्किल था उतना ही मुश्किल था इस धाम में मौजूद निशानियों को खारिज कर देना. इस मंदिर के योगी बहुत से तर्क से दे रहे थे जो साबित करते हैं कि बाबा गोरखनाथ सतयुग से कलयुग तक मौजूद हैं. शुरुआत सतयुग से ही करते हैं जिसका पहला सबूत है शिव पुराण की एक कहानी जिसमें कहा गया कि धरती पर गोरखनाथ का महायोग देखकर सभी देवता हैरान थे. उनमें एक नाम देवी पार्वती का भी था. गोरखनाथ के हठयोग को देखकर देवी पार्वती अचंभे में पड़ गई और महादेव से गोरखनाथ के बारे में पूछा. जवाब में महादेव ने कहा कि गोरखनाथ उन्हीं का रुप हैं.

ऐसी ही एक कहानी का ज़िक्र नादर पुराण में भी मिलता है. नारद पुराण में आता है कि प्रभु से भक्त कह रहे हैं कि गोरखनाथ को किस मंत्र से पूजा जाए तो शिव कहते हैं कि मैं स्वयं गोरख हूं. अब बारी आती है त्रेता युग की. माना जाता है कि गोरखपुर का ये गोरखधाम त्रेता युग से मौजूद है. लोग मानते हैं कि त्रेता युग में यही स्थान बाबा गोरखनाथ की तपोभूमि हुआ करता था. इससे जुड़ी एक कथा वाल्मीकि रामायण में भी मिलती है जिसका रिश्ता है रावण वध के बाद भगरान राम की अयोध्या वापसी से.

गुरु गोरखनाथ की बात करते हैं तो वक्त का कोई मतलब नहीं होता. कहा जाता है कि गोरखनाथ हर युग में मौजूद थे और राम से जुड़ी कहानी भी है. कहा जाता है कि रावण के वध के बाद राम खुद गोरखनाथ के पास आए थे और उनके कानों के कुण्डल यहीं पर बदले गए थे क्योंकि एक ब्राह्मण का वध हुआ था और राम को तभी मुक्ति मिल पाई थी.

भगवान राम ब्राह्मण वध के पाप से परेशान थे. उन्होंने देशभर के कई ऋषि मुनियों से राय मांगी थी और तभी मुनि वशिष्ठ के कहने पर भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान बाबा गोरखनाथ के पास पहुंचे थे और बाबा गोरखनाथ से श्रीराम को इसी जगह पर दीक्षा ली थी और नाथ परम्परा से जुड़ा एक कुंडल पहनाया था. ये कुंडल आज भी नाथ परम्परा से जुड़े योगियों की एक पहचान है. हर योगी को एक अलग तरह का कुंडल पहनना पड़ता है. चाहे वो मंदिर का कोई प्रचारक हो या फिर महंत योगी आदित्यनाथ.

कहा जाता है कि गुरु वशिष्ठ के मुताबिक दीक्षा में कर्णछेदन संस्कार यहीं पर होता है. और सीता को योग की शिक्षा दी गई. पता चला कि जिस जगह पर भगवान राम को दीक्षा दी गई थी वो स्थान आज भी मौजूद है. वहीं पर सिया राम का भव्य दरबार सजा है. रामायण के निशान को निहारते हुए हम आगे बढ़े तो सामने था ये तालाब. पूछा तो पता चला कि ये तालाब त्रेता युग से मौजूद है लेकिन इससे जुड़ी, सबसे बड़ी कहानी जुड़ी है द्वापर युग यानी महाभारत काल से. बताया गया कि इस सरोवर को भीम तालाब कहते हैं.

गुरु गोरखनाथ हर युग में मौजूद हैं और उसका सबसे बड़ा सबूत है ये तालाब. माना ये जाता है कि ये तालाब त्रेता युग से मौजूद है और ऐसा कैसे हुआ इसके पीछे भी एक कहानी है. गोरखनाथ का ज़िक्र महाभारत काल यानी द्वापर युग में हुआ है. पांडवों से जुड़ी एक कहानी के मुताबिक महाबलि भीम बाबा गोरखनाथ को यज्ञ के लिए आमंत्रित करने इस धाम में आए थे लेकिन उस वक्त बाबा गोरखनाथ गहरी साधना में लीन थे और भीम को लंबा इंतज़ार करना पड़ा.

ऐसा कहा जाता है कि महाभारत काल में गोरखनाथ को आमंत्रित करने के लिए भीम को भेजा गया. भीम आए थे और भीम के रहने से ही वहां एक सरोवर बन गया और ये मान्यता आज तक चली आ रही है. महाभारत की इस कहानी से जुड़ी निशानी आज भी इस धाम में मौजूद है जिसका सबूत है भीम की ये विशालकाय मूर्ति. एक बोर्ड पूरी कहानी कहता है. ये प्रतिमा आज भी यहां मौजूद है.

बाबा गोरखनाथ की मौजूदगी से जुड़ा सबसे चौंकाने वाला सबूत मिलता है, कलयुग में. बाबा गोरखनाथ की वाणियों में उन शहरों का ज़िक्र मिलता है, जो द्वापर युग में थे ही नहीं. कुछ कहानियों में ज़िक्र मिलता है कि बाबा गोरखनाथ और संत कबीर के बीच कई बार शास्त्रार्थ हुआ था. माना जाता है कि संत कबीर भी गोरखनाथ की वाणियों से प्रभावित थे, कबीर की वाणियों में भी बाबा गोरखनाथ के संदेशों की झलक साफ दिखाई देती है.

इतना ही नहीं सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़े सबूतों में भी बाबा गोरखनाथ की मौजूदगी साबित होती है. जानकारों का कहना है कि ‘आप हड़प्पा की सभ्यता देखेंगे तो पाएंगे की उसमे एक मूर्ति है, बिल्कुल एक योगी की है उसके उसके आसपास जानवर हैं, त्रिशूल की परिकल्पना है.’ ‘जब खुदाई हुई तो उसमें भी मूर्ति मिली है. कहते हैं कि वो इनकी है’.

हमने थोड़ी पड़ताल की, तो हमें ऐसे तमाम ज़िक्र मिले भी. वाकई उस खुदाई में कई ऐसी मूर्तियां मिली थीं, जिसमें योगियों को दिखाया गया है. यानी उस वक्त भी योगियों की मौजूदगी रही होगी. रही बात बाबा गोरखनाथ की, तो पुराणों में लिखा है कि योग की कला बाबा मत्येन्द्रनाथ और बाबा गोरखनाथ से ही शुरु हुई थी. कलयुग में बाबा गोरखनाथ के करिश्मे से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी और है जो जुड़ी है योगी भतृहरि से. उज्जैन के राजा थे, लेकिन गोरखनाथ से मिले, तो सबकुछ छोड़कर नाथ पंथ को अपनाया लिया.

गोरखनाथ के वैसे तो आज भी दुनियाभर में हजारों भक्त हैं लेकिन एक शिष्य जिसकी कहानी आज भी सुनाई जाती है वो हैं राजा भतृहरि. माना जाता है कि भतृहरि ने कई वर्षों तक इसी जगह पर साधना भी की थी. नाथ पंथ से जुड़े योगी आज भी राजा भतृहरि को बाबा गोरखनाथ का सबसे बड़ा शिष्य मानते हैं.

हीर-रांझा की प्रेम कहानी को फिल्मी पर्दे पर आपने देखा होगा लेकिन ये कहानी सिर्फ फिल्मी नहीं, बल्कि हकीकत भी थी. माना जाता है कि जिस वक्त रांझा निराश होकर जंगलों में भटक रहा था, तो उसकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई थी. बाबा गोरखनाथ के संदेशों को सुनकर रांझा इतना प्रभावित हुआ, कि उसने बाबा गोरखनाथ से दीक्षा ली. योगी परम्परा को निभाते हुए बाकायदा कानों में कुंडल तक पहने थे और सांसारिक जीवन को त्यागकर योगी बन गया था. इतिहास के लेखों में इस कहानी का ज़िक्र भी किया गया है.

गोरखनाथ की तपोभूमि भले ही गोरखपुर में हो लेकिन उनके भक्त और उनकी कहानियां, दुनियाभर के कई इलाकों में फैली हुई हैं. चाहे नेपाल का शाह राजवंश हो या फिर मेवाड़ का राजघराना. आप नेपाल के शाह परिवारों के समय में चले जाइए आपको वहां पर गोरखनाथ जी का आशीर्वाद दिखेगा. लेकिन हमें ये जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि बाबा गोरखनाथ को नेपाल के कई इलाके में राजगुरु के साथ-साथ बारिश का देवता माना जाता है और इसकी भी अपनी कहानी है.

एक बार गुरु गोरखनाथ तपस्या कर रहे थे और उन्होंने मेघ मालाओं को बाँध रखा था. यानी गोरखनाथ कहीं शिव के रुप हैं तो कहीं साक्षात इंद्र भी. किसी के लिए गुरु हैं तो किसी के लिए महायोगी. इन कहानियों को समझने के बाद, हमने गोरखनाथ पीठ का जायजा लेना शुरु किया. पहली नज़र पड़ी गौशाला पर जहां सैकड़ों गायें हैं. बताया गया कि इंसानों की तरह यहां की गायें भी प्रेम का सबक सिखाती हैं.

इस धाम में गौशाला की मान्यता इसलिए भी ज्यादा क्योंकि बाबा गोरखनाथ ने गौशाला में ही अवतार लिया था और यहां गोरक्षा को ही धरती की रक्षा से जोड़ा जाता है. लोगों ने बताया कि गायों की देखभाल की जिम्मेदारी खुद पीठ के महंत उठाते हैं. यहां के लोगों का कहना था कि ‘गुरु गोरखनाथ मंदिर में ये वो गौशाला है जहां करीब 350 गायें हैं. यहां हर गाय का नाम है और खुद आदित्यनाथ घंटों यहां बिताते हैं. इनसे मिलकर दाना पानी देते हैं. हम पुकारेंगे तो रिस्पॉड नहीं करेंगी लेकिन योगी आदित्यनाथ बुलाते हैं तो ये गायें रिस्पॉन्ड करती हैं.

अब बारी थी इस धाम के चमत्कारों को अपनी आंखों से देखने की और ये समझने की भी कि आखिर योगी आदित्यनाथ के गेरुए कपड़ों का मतलब क्या है? उनके कानों में कुंडल क्यों होते हैं? गले में दिखाई देता जनेऊ, काला क्यों होता है? आखिर क्या रिश्ता बाबा गोरखनाथ और योगी आदित्यनाथ के बीच? गोरखनाथ के धाम में हमें बताया गया कि अगर आप इन योगियों की वेश-भूषा को देखें, तो रहस्य साफ हो जाएगा. जैसे योगियों के कान में डाले गए कुंडल, उनके गले का जनेऊ और उस जनेऊ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक. इस रहस्य से पर्दा उठाएंगे अगले अंक में.

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