Wednesday, January 27, 2021

गोरखपुर का एक ऐसा गांव जहां पर है मोरों की बस्ती, 150 से ज्यादा मोर….

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राष्ट्रीय पक्षी मोर (Peacock) के देखने के लिए शहरों में लोगों को चिड़ियाघर जाना पड़ता है. गांवों में अगर बाग-पानी की व्यस्था है तो घंटो इंतजार करना पड़ता है मोर देखने के लिए. वहीं, सीएम सिटी गोरखपुर (Gorakhpur) एक ऐसा गांव है जहां पर लोगों की घरों की छतों, गलियों, खेत खलिहान में मोर नाचते झूमते दिख जाते हैं. जिला मुख्यालय के 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित खोराबार ब्लॉक के कोनी गांव को लोग मोर वाले गांव के रूप में भी जानते हैं. यहां पर कोई भी मोर को पिंजड़े में नहीं रखता है. न ही अपने घर में पालता है. फिर भी मोर गांव के आस पास ही रहते हैं. गांव वाले कहते हैं कि अगर कोई मोर गांव से बाहर चला जाता है तो फिर वापस भी लौट आता है.

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गांव के हर घर में मोरपंख मिलता है. ग्रामीण कहते हैं कि 1998 में जब गोरखपुर में भीषण बाढ़ आई थी. तब उसी बाढ़ में दो जोड़े मोर गांव में आ गये थे. जिसके बाद गांव वालों उन दोनों को भीषण बाढ़ से बचाने के साथ उनके रहने की व्यवस्था की. जिसके बाद से गांव में ही मोर रहने लगे आज 150 से अधिक मोर गांव में रहते हैं. गांव का कोई भी व्यक्ति मोरों को मार नहीं सकता है. अगर बच्चे किसी मोर को परेशान करते हैं तो ग्रामीण उन बच्चों को भगा देते हैं.

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कोनी गांव में मोर लोगों के जिन्दगी का एक हिस्सा बन गये हैं. कोनी गांव के चार तालाब में पानी हमेशा भरा रहता है. तालाब के पास बांस के घने जंगल और झाड़ियां है. जो मोरों के प्रजनन करने और रहने के लिए सबसे बेहतर हैं. साथ ही गांव के प्राथमिक विद्यालय परिसर में भी काफी हरियाली है. ऐसे में गांव में मोरों को कीड़े मकोड़े, चूहे छिपकली, सांप खाने को मिल जाते हैं और गांव वालों को इससे छुटकारा भी मिल जाता है. लोग अपने घरों की छतों पर भी अनाज और पानी रखते हैं. इसलिए उन्हे ये गांव बहुत पंसद है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि मोरनी साल में अक्टूबर से जनवरी के बीच अंडे देती है. एक बार में वह तीन से पांच अंडे देती है, अंडा सेने और बच्चों के परवरिश की जिम्मेदारी अकेले मोरनी की होती है. अंडे से चूजे निकलने में 25 से 30 दिन लगते हैं. एक साल बाद नर और मादा की पहचान होने लगती है. एक मोर औसतन 20 साल तक जिंदा रहता है. साथ ही मोरनियों के साथ समूह बना कर रहता है. ये अक्सर झाड़ियों के बीच जमीन पर घोसला बनाते हैं और पेड़ों की डालियों पर खड़े खड़े ही सोते हैं. मोरों को बचाने और उनके रहने खाने की व्यवस्था करने के कारण वन विभाग ने गांव वालों को बर्ड गार्जियन का खिताब दिया है.

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