Tuesday, June 15, 2021

गोरखपुर के कवि सम्मेलन में कुमार विश्वास, मशहूर कवियों से खिल उठी काव्य की महफिल…

गोररखपुर :फर्जी अस्पताल में कम्पाउंडर चला रहा ओपीडी

गोररखपुर :फर्जी अस्पताल में कम्पाउंडर चला रहा ओपीडीकोरोना काल मे फर्जी अस्पतालों की आई बाढ़ (((अंगद राय की कलम से)))

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दूसरों की मदद करने से जो खुशी मिलती है वही असली आनंद :- पवन सिंह

कुछ करने से अगर खुशी की अनुभूति होती है तो उससे बढ़कर आनंद किसी में नहीं है। आनंद को शब्दों में व्यक्त...

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 कुमार विश्वास जैसे मशहूर कवि के हाथों में मंच का संचालन हो और आमंत्रित करने के लिए देश के नामचीन कवि, तो काव्य का रंग जमना ही था। एमपी इंटर कॉलेज के मैदान में दैनिक जागरण की ओर से सजाई गई काव्य की महफिल इस ध्रुव सत्य की गवाह बनी। महफिल में प्यार की कशिश थी तो ठहाका लगाने के लिए बेहतरीन हास्य व्यंग्य भी भरपूर था। हाल में संपन्न लोकसभा के चुनावी माहौल का असर भी मंच पर खूब रहा। चुनावी तंज पर कवियों ने जमकर तालियां बटोरीं। पुलवामा का दर्द और एयर स्ट्राइक का जोश भी रचनाओं में दिखा, जिसे सुन कभी श्रोताओं की भुजाएं फड़कीं तो कभी मन भावुक हुआ। जिंदगी का फलसफा बताकर जीवन में सपने दिखाने वाली रचनाएं दिल में उतर गई।

वीएस बंधन इन्फ्रा सिटी डेवलेपर्स प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से आयोजित कवि सम्मेलन की शहर के गण्यमान्य लोगों ने दीप प्रज्ज्वलित कर औपचारिक शुरुआत की तो कुमार विश्वास ने चुनावी माहौल पर तंज कसते हुए सिलसिले को बखूबी आगे बढ़ाया। साहित्य और सत्ता के रिश्ते की अनिवार्यता और उसकी सजगता बताते हुए कुमार विश्वास ने सबसे पहले प्रयागराज राज से आए कवि अखिलेश द्विवेदी को ‘मुस्कुराती हुई जिंदगानी चाहिए, शब्द की जागृत कहानी चाहिए’ सुनाकर काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया।

कृषकाय कवि अखिलेश ने मंच संभालते ही यह साबित कर दिया कि वह शरीर से कमजोर जरूर हैं लेकिन उनकी कविताएं लोगों के जेहन में मजबूत और अमिट छाप छोड़ने वाली हैं। ‘शानदार गोरखपुर के जानदार श्रोताओं’ के नारे के बीच जब उन्होंने खुद की काया की खिल्ली उड़ाई तो पूरा परिसर ठहाकों से गूंज उठा।

काव्य पाठ का सिलसिला कुछ यूं आगे बढ़ा

कभी सर्दी, कभी बारिश तो कभी दोपहर से गुजरे।

नहीं मालूम हमको कहां किस पहल से गुजरे।

अपने जीवन के रंजोगम दबाकर अपने सीने में।

लुटाया प्यार ही हमने, जहां जिस शहर से गुजरे।

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बीच-बीच में सम-सामयिक टिप्पणी से लोगों को हंसाते हुए हास्य रचनाओं की प्रस्तुति से वह आगे बढ़े।

जो था खराब वो सबसे अच्छा निकल गया।

झूठ के घर में देखिए सच्चा निकल गया।

चच्चा ने राजनीति में बच्चा जिसे माना

बच्चा वही चच्चा का भी चच्चा निकल गया

बाबा राम रहीम और हनीप्रीत पर हास्य व्यंग से उन्होंने काव्य पाठ के सिलसिले को विराम दिया।

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अखिलेश के बाद कुमार विश्वास ने काव्य पाठ का सिलसिला बढ़ाने के लिए माइक पर आमंत्रित किया युवा कवि प्रख्यात मिश्रा को। प्रख्यात ने आते ही स्थिति साफ कर दी कि वह माहौल में देशभक्ति का रंग भरेंगे। करगिल से लेकर पुलवामा और एयर स्ट्राइक को कविताओं में पिरोकर उन्होंने सभी में जोश भर दिया।

बोटी-बोटी कट जाऊं इंच-इंच बंट जाऊं

लाड़ला न पुरखों की नाक को कटाएगा

या तो ये तिरंगा में घर लौट आऊंगा मां

या तो ये तिरंगा सीमा पार लहराएगा।

लोगों की दाद मिली तो प्रख्यात का हौसला बढ़ गया। उन्होंने एक शहीद की मां का दर्द सुनाकर माहौल का भावुक कर दिया।

अभी नहीं, अभी नहीं, अभी नहीं

रुको जरा रुको जरा रुको जरा

कि राह देखती रही यह शाम अभी ढली नहीं

कि इंतजार में ढली दिवालियां जलीं नहीं

प्रख्यात के बाद कुमार विश्वास ने चंबल से आए कवि रामबाबू सिकरवार को मंच से काव्य पाठ के लिए यह कहकर बुलाया कि हरकतों से वह उनके साढ़ू हैं। कुमार ने साढ़ू का देशी मतलब बताया तो लोग खूब हंसे। रामबाबू ने भी श्रोताओं को हंसाते रहने की जिम्मेदारी खूब निभाई। फिल्मी गानों की तर्ज पर उन्होंने अपनी कविताओं की जो पैरोडी सुनाई, उसका साथ लोगों ने बाकायदा गाकर दिया। शुरुआत उन्होंने कांग्रेस की हार की चर्चा राहुल और सोनिया पर तंज से की।

सब आंकड़े मोदी ने अस्त व्यस्त कर दिए

उठ रहे सवाल सब निरस्त वह कर दिए

जितने गढ़ किले थे सभी ध्वस्त कर दिए।

इसी क्रम में उन्होंने एक और पैरोडी सुनाई

गधों अब झूल सिलवावो, जमाना खूब आया है

लालू पर कटाक्ष से उन्होंने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया और सुनाया

कल थे जो बिहार के राजा

आज बज गया उनका बाजा

जज बोले तो जेल में जा जा

चारा और खाजा, चारा और खाजा

लोगों के बढ़े उत्साह को कुमार विश्वास ने नेताओं पर तंज से और आगे बढ़ाया और फिर फिराक को याद कर गोरखपुर के लोगों से जुड़ने की कोशिश की। यह कोशिश इसलिए थी कि उन्हें मंच पर महिला शायर चांदनी पांडेय को आमंत्रित करना था। अपने गांव के कवि जगपाल सिंह सरोज की कविता- देख पालकी जिस दुल्हन की, बहक गया हर एक बाराती, जिसके द्वार उठेगा घूंघट जाने उस पर क्या बीतेगी, सुनाकर उन्होंने चंादनी को बुलाया तो उन्होंने भी फिराक को याद करके ही अपना काव्य पाठ शुरू किया। उन्होंने सुनाया

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होश रहता नहीं नींदें भी उड़ा देती है

जिंदगी यूं भी मोहब्बत की सजा देती है

पर यह जो दहशत है तुझे खोने की

यह मेरे इश्क को कुछ और बढ़ा देती है

इश्क से जुड़ी कविता पर चांदनी को जब युवाओं की दाद मिली तो उन्होंने इस सिलसिले को पूरी तबीयत से आगे बढ़ाया

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किसे तलाश करुंगी, किसे बुलाएंगी

खुद अपनी जंगल लडूंगी तो जंग जाऊंगी

और दिलों के बीच में शर्ते नहंीं हुआ करतीं

अगर जताए वह प्यार तो लौट आऊंगी।

इश्क और प्यार की कविताओं से बने गंभीर माहौल को बनाए रखने की जिम्मेदारी विश्वास ने सुरेश अवस्थी को सौंपी उन्होंने मिली जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए सुनाया

सोच छोटी रख खुद का बेड़ा गर्क न करना

स्वप्न में भी किसी के स्वर्ग को नर्क न करना

चाहते हो जो उसके दिलों में जगह बने

तो भूल कर भी बेटा-बेटी में फर्क मत करना

पारिवारिक माहौल को जारी रखते हुए उन्होंने लोगों को अपनी रचना से एक और नसीहत दी,

अपनी ख्वाहिश के परिंदे पे निशाना रखना

अपनी जिंदगी का सफर सुहाना रखना

घर को होटल की तरह खूब सजाना

दिल के महलों में लेकिन बुजुगरें का ठिकाना रखना।

सुरेश अवस्थी के बाद माइक पर बुलाए गए स्थानीय मशहूर शायर डॉ. कलीम कैसर। उन्होंने शायरी के माध्यम से नसीहत का सिलसिला जारी रखा।

वक्त की खुशनुमा कलाई पर

सोने-चादी की घड़ी है बेटी

बाप का सिर नहीं झुकेगा कभी

उसकी पगड़ी में है जड़ी बेटी

ईद के दिन सेवइयों जैसी

है दीवाली में फुलझड़ी बेटी

बेटी के बाद डॉ. कैसर ने अपनी शायरी से मां को अल्लाह की रहमत से जोड़ा।

ऐसी अल्लाह की रहमत नहीं देखी मैंने

मा से बेहतर कोई औरत नहीं देखी मैने

अंत में कुमार विश्वास ने अपनी मशहूर कविताओं को सुनाकर महफिल का ऐसा समापन किया कि जिसे शहर के लोग वर्षो याद रखेंगे।

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