Sunday, October 13, 2019
Gorakhpur

गोरखपुर में यहाँ बन रहा कुतुबमीनार से भी दोगुना ऊंचा यूरिया प्लांट का टॉवर…..

हिन्दुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) के यूरिया प्लांट के प्रीलिंग टॉवर (यूरिया खाद का दाना बनाने का स्थान) की ऊंचाई कुतबमीनार से भी दोगुनी होगी। जापानी कंपनी द्वारा निर्माणाधीन 149.5 मीटर ऊंचे टॉवर में से 115 मीटर ऊंचाई तक निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इसी टॉवर की 117 मीटर की ऊंचाई से अमोनिया गैस का लिक्विड गिराया जाएगा। अमोनिया के लिक्विड और हवा के रिएक्शन से नीम कोटेड यूरिया बनेगी।

एचयूआरएल द्वारा करीब 7500 करोड़ की लागत से देश का सबसे बड़ा यूरिया प्लांट लगाया जा रहा है। प्लांट का आकर्षण प्रीलिंग टॉवर है, जो 149.5 मीटर होगा। यह ऊंचाई कुतुबमीनार से दोगुने से भी अधिक है। कुतुबमीनार की ऊंचाई 73 मीटर है। यूरिया प्लांट के टॉवर का व्यास भी कुतुबमीनार से दोगुना है। कुतुबमीनार का व्यास 14 मीटर है तो वहीं टॉवर का व्यास 28 से 29 मीटर है। जापान की कंपनी टोयो ने 115 मीटर ऊंचाई तक टॉवर का निर्माण कर लिया है। करीब एक किलोमीटर दूरी से ही दिख रहे टॉवर को लेकर लोगों में कौतुहल है।

देश में सबसे ऊंचा प्रीलिंग टॉवर होगा यूरिया प्लांट का

गोरखपुर के यूरिया प्लांट के प्रीलिंग टॉवर की ऊंचाई देश की फर्टिलाइजर कंपनियों में सर्वाधिक है। गोरखपुर से पहले सबसे ऊंचा टॉवर कोटा के चंबल फर्टिलाइजर प्लांट का था। जो करीब 142 मीटर ऊंचा है। गोरखपुर के साथ ही सिंदरी, बरौनी, पालचर और रामगुंडम में यूरिया प्लांट का निर्माण किया जा रहा है। अन्य सभी यूरिया प्लांट के टॉवरों की ऊंचाई गोरखपुर के प्लांट से कम है।

प्रीलिंग टॉवर से ऐसे बनेगी यूरिया

गेल द्वारा बिछाई गई पाइप लाइन से आने वाली नेचुरल गैस और नाइट्रोजन के रिएक्शन से अमोनिया का लिक्विड तैयार किया जाएगा। अमोनिया के इस लिक्विड को प्रीलिंग टॉवर की 117 मीटर ऊंचाई से गिराया जाएगा। इसके लिए ऑटोमेटिक सिस्टम तैयार किया जा रहा है। अमोनिया लिक्विड और हवा में मौजूद नाइट्रोजन के रिएक्शन ने यूरिया छोटे-छोटे दाने के रूप में टॉवर के बेसमेंट में ने कई होल के रास्ते बाहर आएगा। यहां से यूरिया के दाने ऑटोमेटिक सिस्टम से नीम का लेप चढ़ाए जाने वाले चैंबर तक जाएंगे। नीम कोटिंग होने के बाद तैयार यूरिया की बोरे में पैकिंग होगी।

हवा की औसत रफ्तार से तय हुई टॉवर की ऊंचाई

यूरिया प्लांट में टॉवर की ऊंचाई हवा की औसत रफ्तार के बाद तय की जाती है। इसके लिए एचयूआरएल की टीम ने करीब महीने भर हवा की रफ्तार को लेकर सर्वे किया। जिसके बाद प्रीलिंग टॉवर की ऊंचाई तय की गई। टॉवर से तय ऊंचाई से अमोनिया का लिक्विड गिराये जाने के बाद हवा के रियेक्शन से यूरिया बनती है।

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