Monday, September 20, 2021

जरूर पढ़ें:- पर्यावरण प्रदूषण और उनके कारण होने वाले रोग – प्रोफेसर डॉ योगेन्द्र यादव

गोरखपुर:- बोरे में भरकर लाश को ठिकाने लगाने ले जा रहे जीजा साले को पुलिस ने किया गिरफ्तार

बोरे में भरकर लाश को ठिकाने लगाने ले जा रहे जीजा साले को पुलिस ने किया गिरफ्तार गोरखपुर। दिल्ली...

Maharajganj: औकात में रहना सिखो बेटा नहीं तो तुम्हारे घर में घुस कर मारेंगे-भाजपा आईटी सेल मंडल संयोजक, भद्दी भद्दी गालियां फेसबुक पर वायरल।

Maharajganj: महाराजगंज जनपद में भाजपा द्वारा नियुक्त धानी मंडल संयोजक का फेसबुक पर गाली-गलौज और धमकी वायरल। फेसबुक पर धानी मंडल संयोजक...

खुशखबरी:-सहजनवा दोहरीघाट रेलवे ट्रैक को मंजूरी 1320 करोड़ स्वीकृत

गोरखपुर के लिहाज़ से एक बड़ी ख़बर प्राप्त हो रही है जिसमे यह बताया जा रहा है कि सहजनवा दोहरीघाट रेलवे ट्रैक...

दोषियों के खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई: सांसद कमलेश पासवान

दोषियों के खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई: सांसद बांसगांव लोकसभा के सांसद कमलेश पासवान ने कास्त मिश्रौली निवासी भाजपा नेता...

पूर्वांचल में मदद की परिभाषा बदलने का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हैं युवा नेता पवन सिंह….

युवा नेता पवन सिंह ने मदद करने की परिभाषा पूरी तरह बदल दी है. उन्होंने मदद का दायरा इतना ज्यादा बढ़ा दिया...

Download GT App from
Google Play

विज्ञापन के लिए संपर्क करें +91 7843810623 (WhatsApp)

प्रकृति ने जीवों के संरक्षण, संवर्धन और सुचारु जीवन के लिए एक ऐसे आवरण का निर्माण किया है। जिसे पर्यावरण कहते हैं। लेकिन मनुष्य जैसे-जैसे शिक्षित होता गया। उस पर भोग का भूत सवार हो गया। अपनी कभी न मिटने वाली भोग रूपी प्यास को बुझाने के लिए वह प्रकृति के आवरण को निरंतर क्षति पहुंचाता रहा। उसी आवरण को चीर-चीर कर अपनी भोग लिप्सा को शांत करता रहा है। विकास की प्रक्रिया की गति उसने इतनी तीव्र कर ली कि जीवन की गाड़ी ही लहराने लगी। और कब कहाँ दुर्घटनाग्रस्त होकर वह जीवन को समाप्त कर देगी, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है । कोरेना महामारी ने पूरे विश्व को एक बार फिर इस दिशा में चिंतन करने को मजबूर किया है। समस्त विश्व के नागरिक अपने जीवन के अस्तित्व के लिए घरों में बैठे संघर्ष कर रहे हैं। सोशल डिस्टेन्सिंग की तो बात की जा रही है। लेकिन उसके बहाने ही सही मानव जीवन के उपयोगी पर्यावरण के संरक्षण की बात नहीं की जा रही है।
पर्यावरण प्रदूषित होने का सबसे अधिक प्रभाव अन्य जीवों के साथ मनुष्य पर भी पड़ता है । मनुष्य ने अपनी नासमझी से जहां अपने मित्र कीट-पतंगों-जीवाणुओं-विषाणुओ का विनाश कर डाला है । यह पर्यावरण प्रदूषित कर उन्हें भी इतना विषाक्त कर डाला है कि उनकी भी प्रकृति बदल गई है । जो कीट-पतंग, विषाणु-जीवाणु मनुष्य के लिए उपयोगी हुआ करते हैं, या तो उनका अस्तित्व समाप्त हो गया या उनकी क्रियाशीलता ही प्रभावित हो गई । जिसका सीधा प्रभाव अब मनुष्य और उसके जीवन पर दिखाई दे रहा है। पूरी सृष्टि के समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया। सिर्फ लोगों के संपर्क में आने से ही लोग संक्रमित होने लगे हैं। विषाक्त विकिरण और हानिकारक रसायनों ने प्रदूषण को और बढ़ावा दे दिया। जिसकी वजह से नभचर और जलचर जैसे तमाम जीव, जीवाणु-विषाणु समाप्त हो गए। जो हवा और पानी को विशुद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे। उन्हें ही हमने समाप्त कर डाला। जिसकी वजह से अनेक पर्यावरणजनित बीमारियाँ प्रकाश में आई । आज स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि बीमार होने के लिए उम्र का बंधन ही समाप्त हो गया। बुढ़ापे में होने वाली बीमारियों के लक्षण बच्चों में भी दिखाई पड़ने लगे हैं। जो बीमारियाँ बच्चों को होती रही, अब युवाओं में भी परिलक्षित हो रही हैं । अगर हम विश्व की बातें करें, तो विकसित देशों में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या कम दिखाई देती है। जबकि विकासशील या अविकसित देशों में यह समस्या अपने चरम पर है। इसी कारण विकसित देशों की तुलना में बीमारियों का संक्रमण विकासशील और अविकसित देशों के लोगों में अधिक पाया जाता है। यानि पर्यावरणजनित बीमारियो से विकासशील और अविकसित देशों के लोग अधिक संक्रमित होते हैं ।
विषाक्त धातुएँ, धातु उद्योगों से निकलने वाले धुए, जैविक कचरा, ऑटोमोबाइल और कोयले संबंधी उद्योग निकलने वाली भारी धातुएँ और कण वायु को प्रदूषित करते हैं। जो सांस लेते समय लोगों के फेफड़ों में चले जाते हैं और श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियों के कारण बनते हैं।
गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। इनकी संख्या हर दिन बढ़ जाती है । पहले पेट्रोल और डीजल में लेड की मात्रा अधिक होती थी। लेकिन इसकी भयंकरता को देखते हुए अब लेड मुक्त पेट्रोल और डीजल मिलने लगे हैं। इसके बावजूद इसमें कार्बन ड़ाई आक्साइड और मोनो कार्बन ड़ाई आक्साइड की मात्र बहुत अधिक होती है। जो वायु को प्रदूषित ही नहीं विषाक्त बना देती है, ऐसे में सड़क के किनारे रहने वाले और महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों और उसके आस-पास रहने वालों को इसकी वजह से अनेक बीमारियाँ होती हैं।
लोहे, ताबे और चाँदी का शोधन में जीवाश्म ईधन का उपयोग होता है। जिन्हें जलाने पर उससे आर्सेनिक निकलता है। उर्वरक कारखानों से से जो तरल पदार्थ निकलता है, उसमें भी आर्सेनिक पाया जाता है। इस प्रकार आर्सेनिक की वजह से जहां एक ओर वायु प्रदूषण होता है, वहीं दूसरी हो जल भी प्रदूषित होता है। ऐसे वातावरण में रहने या ऐसे जल का सेवन करने से प्रदूषण संबंधी अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
पर्यावरण प्रदूषण जनित रोग एक-दूसरे से सीधे संपर्क में आने, स्पर्श करने, प्रदूषित जल का सेवन, या प्रदूषित वायु या वातावरण में उपस्थित रहने, मच्छर, मक्खियों और मनुष्य के संपर्क में आने वाले अन्य कीट-पतंग हैजा, टाइफाइड और हैपिटाइटिस मलेरिया, पीत ज्वर, इनसैफेलिटिस (हाथी पांव, फाइलेरिया) और डेंग्यू जैसी बीमारियों को फैलाते हैं।
भारत देश के युवाओं की अगर बात करें, तो अधिकांश शहरी और ग्रामीण युवक धूम्रपान करते हुए दिखाई पड़ते हैं। जिससे उनका पेट, यकृत, प्रोस्टेट, कोलन और मलद्वार प्रभावित होता है । वे खुद तो खुद प्रभावित होते हैं। उनके आस-पास रहने वाले लोग भी सिगरेट धुआँ मिश्रित हवा में सांस लेने के कारण उनके अंदर भी यह धुआँ अधिक – कम मात्रा में जाता है। जिसकी वजह से उन्हें भी वही सब परेशानी होती है, जो धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को होती है । धूम्रपान करने और तंबाकू चबाने से सबसे बड़ा डर कैंसर होने का रहता है । जो आज भी एक लाइलाज बीमारी बनी हुई है। इसे वायु प्रदूषण के रूप में लिया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्रों में निवास करने वाले बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो धूम्रपान तो नहीं करते, लेकिन वायु प्रदूषण के कारण उन्हें भी पेट संबंधी तमाम बीमारियाँ हो जाती है। कभी-कभी यह सुनने में आता है कि वह व्यक्ति तो कोई नशा नहीं करता था, फिर भी उसे कैंसर हो गया ।
वायु प्रदूषण में हो रही लगातार वृद्धि की वजह से ओज़ोन परत क्षीण होती जा रही है। ब्लैक होल के व्यास में निरंतर वृद्धि हो रही है। जिससे सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणें सीधे त्वचा पर पड़ती हैं, और स्किन कैंसर से लेकर त्वचा संबंधी कई बीमारियाँ हो जाती हैं ।
रेडियोऐक्टिव पदार्थों और उनके अंदर होने वाली स्वत: विकिरण की अभिक्रियाओ की वजह से भी त्वचा को हानी पहुँचती है। और स्किन कैंसर से लेकर स्तन कैंसर, थायराइड, फेफड़े, पेट आदि अंगों में भी कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। जिस – जिस अंग पर रेडियोऐक्टिव किरणे पड़ती है, उस-उस अंग पर कैंसर होने की अधिक संभावना रहती है ।
यह देखने में आया है कि वायु और जल प्रदूषण की वजह से लोगों में एलर्जी की भी बीमारी हो जाती है । रोगी अधिक उत्तेजित हो जाता है। प्रदूषण का प्रभाव उसकी रोग से लड़ने की क्षमता पर पड़ता है। रोगों से लड़ने की क्षमता कम होने की वजह से वह कई सामयिक बीमारियों का शिकार हो जाता है। प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के सामान्य लक्षण में रोगी की नाक बहना, आँखों और कानों में खुजली, सांस फूलना, साइनस, गले में सूजन, शरीर पर लाल दाने पड़ना, अस्थमा, एक्जिमा, और सरदर्द होता है ।
यह देखने में आ रहा है कि जानकारी न होने की वजह से किसान अपनी फसलों में जरूरत से अधिक नाइट्रोजन खाद का उपयोग कर रहा है। नाइट्रोजन जल में घुलनशील होता है। जिसकी वजह से भूमिगत जल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। अगर इस प्रकार प्रदूषित जल का उपयोग माँ करती है, तो दूध पीते शिशुओं को मेथाईमोग्लोबिनेमिया नमक रोग हो जाता है। जिसमें बच्चा रोता बहुत है । इस रोग में बच्चा एनीमिक हो जाता है। उसका शरीर नीला पड़ने लगता है। इसी कारण इस रोग को ब्लू बेबी रोग कहते हैं। इस रोग का सामान्य लक्षण यह है कि बच्चा सोता अधिक है। दूध कम पीता है। और दिन पर दिन कमजोर होता जाता है।
अस्थमा में रोगी को सांस लेने में कठिनाई होती है । कभी-कभी रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसकी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे ही रुक गई। इसकी क्रोनिक अवस्था में रोगी की जान भी जा सकती है । चिकित्सक इस रोग का कारण एलर्जी बताते हैं, जो पर्यावरण प्रदूषण की वजह से होती है। जो लोग प्रदूषित वातावरण में रहते है, उन्हे यह बीमारी अधिक होती है । सांस फूलना, घरघराहट होना, छाती में दर्द होना, खांसी (कफ) अस्थमा के प्रमुख लक्षण हैं।
बहरापन ध्वनि प्रदूषित क्षेत्र में रहने वालों लोगों में सामान्य तौर पर यह बीमारी थोड़ी-अधिक मात्रा में पाई जाती है। 90 db से अधिक ध्वनि प्रदूषित क्षेत्र में लगातार रहने पर बहरापन स्थायी रूप से हो सकता है।
चिड़चिड़ापन अधिक ध्वनि प्रदूषण में रहने वाले लोगों के व्यवहार का अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि वे बहुत जल्दी चिढ़ जाते हैं, खीझ जाते हैं, मनोरोगी भी हो जाते हैं। बात – बात पर क्रोधित हो जाते हैं। जिसकी वजह से उनका पारिवारिक और सामाजिक जीवन प्रभावित हो जाता है।
हैजा प्रदूषित जल पीने से रोगी की आंते संक्रमित हो जाते हैं, जिसकी वजह से पेट में असहनीय दर्द व मरोड़ के साथ उल्टी दस्त होने वाली लगती है, और बहुत ही कम समय में शरीर में जल की कमी हो जाती है। अगर संक्रमित व्यक्ति का समय पर इलाज नहीं किया गया, तो मृत्यु भी हो सकती है।
बिवाई यह भी प्रदूषित पर्यावरण में रहने और ठीक से साफ-सफाई न करने की वजह से होने वाला रोग है। इसमें रोगी की एड़ियाँ फट जाती हैं और चलने में असहनीय पीड़ा का अनुभव होता है। उस स्थान की त्वचा, कड़ी, रूखी हो जाती है। उसके पीछे यह कारण होता है कि उस स्थान की स्वेद ग्रंथियां मर जाती हैं।
डेंगू यह रोग भी संक्रमित एडीज़ एजीप्ति नामक मच्छरों के काटने से होता है। जो प्रदूषण के कारण उत्पन्न होते हैं। इसमें असहनीय शारीरिक पीड़ा के साथ तीव्र बुखार आता है। आँखों में दर्द और शरीर पर चकट्टे पड़ जाते हैं। गले में खरास उत्पन्न हो जाती है। जिसकी वजह से भोजन या पानी भी निगलने में तकलीफ होती है।
फाइलेरिया बीमारी भी पर्यावरण प्रदूषण के कारण होती है और संक्रमित फ्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस मच्छरों के काटने से होती है। जिसके लक्षण 7-8 साल बाद दिखाई पड़ते हैं। इसमें रोगी का पैर फूल कर बहुत मोटा हो जाता है। जिसकी वजह से उसे चलने –फिरने में बहुत तकलीफ होती है। इसी कारण भारत के हिन्दी प्रदेशों में इस रोग को हाथी पाव भी कहते हैं।
मलेरिया प्रदूषित जगहों पर मच्छर पनपते हैं। और एनाफिलीज़ नामक संक्रमित मादा मच्छर के काटने पर यह रोग होता है। इसमें संक्रमित व्यक्ति को ठंड लग कर तेज बुखार आता है। साथ में पूरा शरीर और सर भी दर्द करता है।
टाइफाइड प्रदूषित पर्यावरण के कारण होने वाली यह एक गंभीर बीमारी है । प्रदूषित भोजन और पानी खाते-पीते समय यह बैक्टीरिया पेट के अंदर चला जाता है। इस बीमारी से संक्रमित रोगी को सरदर्द, शरीर दर्द के साथ तेज बुखार होता है। जो ठीक होने का नाम नहीं लेता है। इसमें हमेशा जी मिचलाता रहता है, साथ ही कब्ज भी बनी रहती है।
पीत ज्वर रोग प्रदूषित पर्यावरण के कारण ही होता है। गंदगी में एडीज़ इजीप्ति नामक मच्छर पैदा होते हैं। जिनके काटने से यह बुखार होता है। इस प्रकार के मच्छर रेगिस्तानों में अधिक पनपते हैं। इस कारण अपने देश में राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों में इससे पीड़ित रोगी पाये जाते हैं। ये मच्छर पानी के जार, बैरल, ड्रम और टायर के अंदर जमा प्रदूषित जल में पैदा होते हैं ।
इसके अलावा जितने भी रोग हैं, पर्यावरण प्रदूषण के कारण उनकी प्रकृति में भी परिवर्तन आया है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण कई नए रोग भी उत्पन्न हुए हैं। इसलिए अगर मनुष्य को स्वस्थ होना है, स्वस्थ रहना है, तो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण को भी न्यूनतम करने की दिशा में भी पहल करने की जरूरत है।

ये भी पढ़े :  इनकी भी होनी चाहिए तारीफ:- लाक डाऊन में भी विद्युत विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों द्वारा निर्बाध विद्युत आपूर्ति....
ये भी पढ़े :  यूपी के युवाओं ने ऑटोमेटिक सैनेटाइजिंग मशीन का निर्माण किया, देखकर अधिकारी भी हैरान रह गए...

प्रोफेसर डॉ योगेन्द्र यादव
पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

Hot Topics

गोरखपुर : सगी बहन से शादी करने की जिद पर अड़ा भाई; यहां जाने क्या है माजरा !

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां चिलुआताल में...

गोरखपुर:चिता पर रखे शव के जीवित होने पर मचा हड़कंप, रोकना पड़ा दाह संस्कार,

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां...

देवरिया:- थाने में ही महिला फरियादी के सामने हस्तमैथून करने वाला थानेदार फ़रार,25 हज़ार के इनाम की घोषणा

देवरिया के अंतर्गत आने वाले थाने भटनी में महिला फरियादी के सामने हस्तमैथुन करने वाली थानेदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज...

Related Articles

पूर्वांचल में मदद की परिभाषा बदलने का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हैं युवा नेता पवन सिंह….

युवा नेता पवन सिंह ने मदद करने की परिभाषा पूरी तरह बदल दी है. उन्होंने मदद का दायरा इतना ज्यादा बढ़ा दिया...

स्वर्णकार समाज ने लोकसभा , विधानसभा में अपने प्रतिनिधित्व के लिए भरी हुँकार,जल्द प्रदेश व्यापी होगी सभा

स्वर्णकार समाज का स्वर लोकसभा एवं विधानसभाओं में मुखरित हो प्रतिनिधित्व सभी पंचायतों में हो इस विचार के साथ स्वर्णकार समाज...

यूपी में कई IPS बदले गए,दिनेश कुमार गोरखपुर के नए एसएसपी.

कई IPS के तबादले हुए जिसमे गोरखपुर के एसएसपी जोगेंद्र कुमार को झाँसी का नया डीआईजी बनाया...
%d bloggers like this: