Friday, August 6, 2021

पत्रकार अगर सरकार का मुलाजिम हो तो यह जनता के साथ गद्दारी है….

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एक सच्चा ‘पत्रकार’ कभी सरकार का ‘मुलाजिम’ नहीं हो सकता, अगर ऐसा है तो यह देश की जनता के साथ गद्दारी है।

भ्रष्टाचार एक मानसिक विकार है चित्त-वृत्ति को विकृत करने वाली एक प्रवृत्ति है मन का विलास है।

चाटुकार और भ्रष्ट पत्रकार के लिए वर्तमान युग में पत्रकारिता सफलता का सर्वश्रेष्ठ साधन है। आप यू कह सकते हैं कि काम निकालने तथा श्री समृद्धि की रामबाण औषध है।
भ्रष्टाचार का रोग बीमार होते हुए भी बहुत मीठा है, प्यारा है। आज के समय में कुछ अप वादों को छोड़कर ज्यादा पत्रकार इसका प्यार पाने का आकांक्षी है इसके प्यार में आकंठ डूब जाने को सब का हृदय मचलता है।
‘निराला’ जी के शब्दों में आज का पत्रकार कहता है कि…
मेरे प्राणों में आओ!
शत शत शिथिल भावनाओं के
उर के तार सजा जाओ!

“कोई भी संस्था त्रुटिहीन नहीं होती, उसमें कुछ ना कुछ त्रुटी अवश्य विद्यमान होती है” यह बात आज पत्रकार/मीडिया पर भी लागू होती है।
ठीक उसी प्रकार एक तरफ जहां मीडिया में एक और इमानदार पत्रकार है जो सिर्फ़ अपने काम से मतलब रखते हैं दिन रात काम करते हैं। संवाददाता सम्मेलन या किसी सार्वजनिक सम्मेलन में गए तो खाना या गिफ्ट तक नहीं लेते हैं सम्मेलन कवर किया और चल दिए। वहीं दूसरी तरफ मीडिया का दूसरा रूप भ्रष्ट मीडिया जहां पत्रकार सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं कई तो खाने या गिफ्ट के नाम पर हंगामा भी मचा देते हैं, भारत में इसकी स्थिति बहुत ही दयनीय है।

आज पत्रकारिता में भ्रष्टाचार इस हद तक बढ़ चुका है कि मीडिया के मालिक काफी तादाद में संसद में नेताओं के साथ बैठे मिलते हैं अर्थात भ्रष्ट मीडिया और भ्रष्ट राजनेता मिलकर काम करते हैं। मीडिया भी धन का लोभी हो चुका है आज भारत में हर कार्य, व्यापार का रूप ले चुका है अर्थात ‘एक हाथ दो, दूसरे हाथ लो’

आज के परिवेश में एक यह भी कहना कहीं गलत नहीं होगा कि “पहले खबरें छप कर बिकती थी, और आज के दौर में खबरें बिक कर छपती हैं”।

डॉ राम मनोहर लोहिया का भाषण आज भी प्रासंगिक है जब उन्होंने 21 दिसंबर 1963 को भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे पर संसद में हुई एक बहस में किया था। उन्होंने कहा था-“सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं है”।

हालांकि इमानदार पत्रकार साथियों ने कई भ्रष्ट घोटालों का पर्दाफाश भी किया है जिसमें बोफोर्स घोटाले रुपए 64 करोड़, यूरिया घोटाले में रुपए 133 करोड़, चारा घोटाले में रुपए 950 करोड़, शेयर बाजार घोटाले में रुपए 4000 करोड़, सत्यम घोटाले में रुपए 7000 करोड़, स्टांप पेपर घोटाले में रुपए 43 हजार करोड़, कॉमनवेल्थ गेम में रुपए 70000 करोड़, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में रुपए 1लाख67 हजार करोड़, अनाज घोटाले में रुपए 200000 करोड़, कोयला आवंटन खदान घोटाले में रुपए192 लाखों-करोड़ों के घोटाले हुए जो प्रमुख है। इन भ्रष्ट घोटालों में कई मीडिया घरानों के भी नाम सामने आए जिनमें से कुछ तो आज करोड़पति और अरबपति भी बन चुके हैं।

आजादी के बाद लगभग सभी बड़े समाचार पत्र पूंजीपतियों के हाथ में है। उनके अपने हित ही निश्चित है तभी तो कहा जाता है कि “मीडिया बाजार की चंगुल में है बाजार अर्थात व्यापार जिसका उद्देश्य ही है अधिक से अधिक लाभ कमाना”. पत्रकार शब्द नाकाफी है अब तो न्यूज़ बिजनेस शब्द का प्रयोग है अनेक नेता और कारपोरेट कंपनियां अखबार का स्पेस (स्थान) तथा टीवी का समय खरीद लेते हैं।
वहां पर न्यूज़, फीचर, फोटो, लेख जो चाहे लगवा दे। भारत की प्रेस कांसिल और न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी वर्तमान में बौनी साबित हो रही है। आजकल अच्छे पत्रकारों युवा लेखकों की सत्य आधारित लेखनी का सम्मान नहीं होता अनेक के लिए तो कूड़ेदान में मिलते हैं। अर्थहीन, दिशाहीन, और अनर्गल लेख उपर स्थान को भर देते हैं। आइए कुछ घोटालों पर विचार करते हैं जिसमें मीडिया की संगीता मुख्य रूप से पाई गई है-
मीडिया को मिशन समझाने वाले दबी जुबान से स्वीकार करते हैं की “नीरा राडिया प्रकरण” ने मीडिया के उच्च स्तरीय कथित भ्रष्टाचार को सामने ला दिया है और मीडिया की पोल खोल रख दी है।

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कोयला घोटाला जिसमें कई मीडिया “हाउस नेम हल्दी लगे ना फिटकरी रंग चढ़े चोखा”मुहावरे को चरितार्थ करते हुए पत्रकारिता की हनक की आड़ में मोटा माल कमाया है। जिसमें से कुछ मीडिया प्रसिद्ध अखबार लोकमत उषा मार्टिन समूह जोकि प्रभात समूह के नाम से प्रसिद्ध है तथा दैनिक भास्कर समूह प्रसिद्ध है।

आज वर्तमान सरकार में भी मीडिया सच्चाई को पूरी तरह दबाने का काम कर रही है, और जो नेताओं की चाटुकारिता और गणेश परिक्रमा कर रहे हैं वह इस सरकार में मोटी मलाई काट रहे हैं जो वर्तमान समय में किसी से छुपा नहीं है। आज जहां राजनीतिक माहौल भ्रष्टाचार की गिरफ्त में दिख रहा है वहीं लोकतंत्र की प्रहरी मीडिया भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। आज किसी को भी सच कहने की हिम्मत नहीं है जो सच कहते और लिखते हैं उनको समाचार संस्थाओं से हटा दिया जाता है। ऐसा लगता है की समाचार संस्थाएं नेताओं और पूंजीपतियों के तलवे चाटने में ही अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है जो पत्रकारिता जगत के लिए बेहद ही शर्म की बात है।

आज के परिवेश में इन सभी घोटालों के अलावा मीडिया का एक भाग है जो कि भ्रष्टाचार में सबसे अधिक लिप्त पाया जा रहा है वह सोशल मीडिया जो कि अपराध, अश्लीलता व भ्रष्टाचार को निश्चित रूप से बढ़ावा दे रहा है टेलीविजन के विभिन्न चैनलों, सिनेमा, केबल नेटवर्क द्वारा जो मनोरंजन परोसा जा रहा है वह भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है।

अगर सच में इन सब को देखा जाए तो पत्रकारों के भ्रष्ट होने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक शोषण का होता है। छोटे व बड़े मीडिया 5 हजार के मासिक वेतन पर 10 से 12 घंटे काम लिया जाता है ऊपर से प्रबंधन की मर्जी जब जी चाहे नौकरी से निकाल दें वेतन के मामले में कलम के सिपाहियों का हाल सरकारी आदेशपलकों से भी बुरा है। ऐसे में यह चिंतनीय विषय है कि वह पत्रकार पानी और हवा पीकर तो अपनी जिंदगी और अपना परिवार गुजारेगा नहीं। लाजमी है कि ख़बर की दलाली करेगा जिससे “खिलाओ-पिलाओ कुछ थमाओ और ख़बर छपवाओ”पंक्ति एकदम सार्थक सिद्ध होती है।

लोकतंत्र में जहां पत्रकार को उसका संरक्षक वह संस्थापक माना गया है। वही आज पत्रकार की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी कई सवाल उठ रहे हैं जो लाजमी में भी है। हमारे देश में आज पत्रकार स्वतंत्र तो पूरी तरह से है किंतु निष्पक्ष आंशिक रूप से ही! इतिहास गवाह है जब जब पत्रकार ने अपनी निष्पक्ष भूमिका के साथ न्याय नहीं किया तब देश भ्रष्टाचार, अराजकता, राजनीतिक ढोंग की चपेट में आ रहा है। मीडिया को सिर्फ टीआरपी का ही ध्यान नहीं देना है बल्कि देश को भ्रष्टाचार मुक्त भी करना है इसके लिए जरूरी है वह स्वतंत्र के साथ साथ निष्पक्ष भी हो। निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण ही तो प्रेस को लोकतंत्र का प्रहरी या लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ का गया है।

देश और समाजहित को सर्वोपरि रखना ही पत्रकारिता की निष्पक्षता की कसौटी है। जिस पर सदैव खराब करना है तभी एक सूत्र में हमका पाएंगे कि स्वतंत्र, निष्पक्ष और भ्रष्ट मुक्त मीडिया ही आज के युग में सफल लोकतंत्र की गारंटी है अन्यथा नहीं।

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आपका ध्यान थोड़ा पीछे ले चलता हूं जब भारत के स्वाधीनता संग्राम में समाचार पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और चाहे जनता तक बात पहुंचाने हो या जागरूकता फैलाने हो तो हमेशा ही देशभक्तों के कंधे से कंधा मिलाकर इस लड़ाई में साथ दिया। जो काबिले तारीफ है। हमारे स्वतंत्र सेनानियों ने इसी माध्यम से जनता तक अपनी भावनाएं पहुंचाए करते थे।

आजादी के बाद भी मीडिया समाज निर्माण एवं लोकतंत्र को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। मीडिया की इमानदारी पर कई बार आरोप लगे व उंगलियां भी उठी किंतु पत्रकारों ने हमेशा से कुछ अपवादो को छोड़कर पूरी निष्ठा से कार्य किया।
याद कीजिए आपातकाल का दौर जब 28 जून, 1975 को लगभग सभी समाचार पत्रों ने विरोध स्वरूप अपने संपादकीय काॅलम को रिक्त रखा था।

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ऐसा बिल्कुल नहीं है की सभी पत्रकार गणेश परिक्रमा और चाटुकारिता में लिप्त हो बहुत से सच्चे कलम के सिपाही है जो तमाम घोटालों को जोखिम उठाकर जनता के सामने रखे हैं। अगर वह पत्रकार ईमानदार और सकरी ना होते तो शायद ही कभी बड़े से बड़ा घोटाला उजागर हो पाता। चुनाव में वोट के बदले नोट जैसे गंभीर मामले कभी जनता के सामने आ पाते यह सब सच्ची पत्रकारिता का ही एक अंग है। अगर पत्रकारिता सजग प्रहरी की तरह काम ना करें कितने ही गंभीर मामले प्रशासन की नजरों तक न पहुंच पाते। पत्रकारों ने राजनीतिक मामलों में ही नहीं बल्कि समाज में अपराध, अंधविश्वास, स्वास्थ्य शिक्षा इत्यादि के विषय में जनता को जागरूक और सजग बनाने का कार्य भी बखूबी किया है।प्रशासन को जगाने से लेकर सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाना पत्रकार ने हर क्षेत्र में स्वयं को सिद्ध किया है।

लेकिन आज जो पत्रकारिता जगत में माहौल चल रहा है वह काफी चिंताजनक है। आज का सत्य है कि भारतीय मीडिया आज पूरी तरह से सत्ता पक्ष के दबाव में काम कर रही है? कुछ सच्चे पत्रकार को छोड़कर।

आपने देखा होगा कि सच्ची पत्रकारिता की सक्रियता के कारण ही अन्ना हजारे का आंदोलन हो या निर्भया के लिए न्याय की मांग का आंदोलन जनता ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं मीडिया की मदद से जनता ने प्रशासन को अपनी ताकत का अहसास भी कराया था। जो किसी से छुपा नहीं है।

और हां यह भी सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों से कुछ स्वार्थ पूर्ण तत्वों ने पत्रकारिता जगत के मूल्यों को गिराने की भरपूर कोशिश की है यह कहना थोड़ा भी गलत नहीं होगा। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जिस पत्रकार ने अपना जीवन जनता तक सही और सटीक जानकारी पहुंचाने एवं उसे जागरूक बनाने में लगा दिया हो उसे कुछेक स्वार्थी तत्वों के कारण, अरे पत्रकारिता समाज को भ्रष्टाचार में लिफ्ट कह देना सरासर बेईमानी होगी।

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर सिर्फ इतना कहूंगा कि पत्रकारिता पांचवा वेद है जिसके द्वारा हम ज्ञान, विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपने बंद मस्तिष्क को खोलते हैं। सूचना, ज्ञान या विचारों को समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ शब्द, ध्वनि और चित्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना ही सच्ची पत्रकारिता है।
पत्रकारिता जीविका के लिए रोजगार का चुनाव नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा और विचारों को सही जगह पहुंचाने का सशक्त माध्यम होना चाहिए।
अपनी कलम को विराम देते हुए कहना चाहता हूं कि पत्रकार साथियों,गलत को गलत और सही को सही लिखते जाओ क्योंकि टकराने वालों का ही इतिहास लिखा जाता है चाटुकारिता करने वालों का नहीं!
क़लम चलती रहेगी!

अनुपम श्रीवास्तव
स्वतंत्र संदेश मासिक पत्रिका
पत्रकार
गोरखपुर।

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