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पूर्वजों को याद कर तिलांजलि दे…पितृपक्ष के एक महीने बाद शुरू होगी नवरात्र….

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पूर्वजों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि, तिलांजलि और पिंडदान करने का पितृपक्ष पूर्णिमा के पिंडदान के साथ दो सितंबर से शुरू होगा। दिन के हिसाब से पितृ पक्ष का पहला तीन सितंबर को होगा। पूर्णिमा के दिन दिवंगत पूर्वजों के लिए एक दिन पहले पिंडदान होता है। पितृ पक्ष के दौरान पूर्णिमा तिथि नहीं मिलती। कोरोना संक्रमण के चलते गायत्री परिवार की ओर से शहीदों और अज्ञात पूर्वजों के नाम से होने वाला सामूहिक पिंडदान नहीं होगा। गायत्री परिवार के मुख्य मीडिया प्रभारी उमानंद शर्मा ने बताया कि सामूहिक रूप से भीड़ नहीं एकत्र की जाएगी। सरकार की ओर से जारी कोरोना रेाकथाम की गाइडलाइन का पालन कराया जाएगा। गायत्री मंदिर में एक साथ पांच लोग शारीरिक दूरी के साथ पिंडदान करेंगे। आचार्य अनुज पांडेय ने बताया कि ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है तो, उसी दौरान पितृ पक्ष शुरू होता है। पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान करने उत्तम माना गया है। आचार्य एसएस नागपाल के अनुसार दो सितंबर 17 सितंबर तक पितृपक्ष चलेगा। 18 सितंबर से अधिकमास शुरू होगा जो 16 अक्टूबर तक चलेगा। चातुर्मास जो हमेशा चार महीने का होता है, इस बार पांच महीने का हो रहा है। चतुर्मास 25 नवंबर को समाप्त होगा। इसके बाद सहालग का दौर शुरु होगा।

क्या है अधिक मास

आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग एक मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को संतुलन के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।

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पितृपक्ष के एक महीने बाद शुरू होगी नवरात्र

हर साल पितृ पक्ष की समाप्ति के अगले ही दिन से नवरात्र शुरू हो जाती है। , लेकिन इस बार यह पर्व पितृ पक्ष समाप्ति के एक माह बाद शुरू होगा। नवरात्र व पितृ पक्ष के बीच एक महीने का अंतर है। आश्विन मास में मलमास लगने व एक महीने के अंतर पर नवरात्र का संयोग 165 साल बाद पड़ रहा है 17 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ नवरात्र की शुरुआत हाेगी और नौ दिनों तक चलेगी। 25 अक्टूबर को अष्टमी और 26 अक्टूबर को दशहरा होगा।

शहीदों की याद में महाआरती

मनकामेश्वर उपवन घाट पर बुधवार को हाेने वाली आदि गंगा की आरती अज्ञात पूर्वजों और शहीदों को तिलांजलि के साथ शुरू होगी। महंत देव्या गिरि ने बताया कि शाम छह बजे से होने वाली आरती के पहले पिंडदान और तिलांजलि दी जाएगी। कोरोना संक्रमण से निधन होने वाले अज्ञात लोगों की आत्मा की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान होंगे।

पितृ पक्ष का महत्व

आचार्य कृष्ण कुमार मिश्रा ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजुर्गो का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। मान्यता है कि यदि विधि अनुसार पितरों का तर्पण न किया जाए तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशास्त्र में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है। जब जातक सफलता के बिल्कुल नज़दीक पंहुचकर भी सफलता से वंचित होता हो, संतान उत्पत्ति में परेशानियां आ रही हों, धन हानि हो रही हों तो ज्योतिषाचार्य पितृदोष से पीड़ित होने की प्रबल संभावनाएं बताते हैं। इसलिये पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है।

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किस दिन करें पूर्वज़ों का श्राद्ध

आचार्य विजय वर्मा ने बताया कि वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिए पिंड दान या श्राद्ध कर्म किए जा सकते हैं, लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वज़ों का श्राद्ध करें इसके लिये शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज़, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिए। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। दुर्घटना अथवा सुसाइड आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिए अष्टमी तो माता के लिए नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिए उत्तम होती है

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