Wednesday, April 24, 2019
Gorakhpur

बिग ब्रेकिंग:- आखिर क्यों कांग्रेस की पहली पसंद बनते जा रहे युवा नेता पवन सिंह….

लोकसभा चुनाव सिर पर आ चुके हैं लेकिन पूर्वांचल की सबसे हाई-प्रोफाइल सीटों में गोरखपुर लोकसभा सीट पर प्रत्याशियों के चयन को लेकर माथापच्ची चर्चा जारी है. इसी कड़ी में गोरखपुर के आम जनमानस में लोकप्रिय युवा नेता पवन सिंह का कांग्रेस के तरफ से सबसे पहली पसंद है। पवन सिंह क्षत्रिय बिरादरी से आते हैं. क्षत्रिय जाति का गोरखपुर शहर व ग्रामीण इलाकों में बहुत दबदबा है.

पूर्वांचल में कहने के लिए तो बहुत से नेता है,लेकिन किसी के पास जनाधार नही है,कोई भी नेता जनाधार के बल पर ही होता है।
पूर्वांचल में देखा जाए तो क्षत्रिय नेताओं में सीएम योगी आदित्यनाथ के बाद युवा नेता पवन सिंह का ही नाम आता है। जिनके एक आह्वान पे हज़ारो लाखो लोगो की भीड़ तैयार रहती है।
आज आम समाज मे सबसे ज्यादा कोई लोकप्रिय है तो वो है युवा नेता पवन सिंह● युवा वर्ग हो,सवर्ण हो,पिछड़ा वर्ग हो,दलित भाई बंधु हो,पवन सिंह एक ऐसा नाम एक ऐसा चेहरा है की इनके लिए हर व्यक्ति जाति बिरादर से ऊपर उठ के इनके साथ रहता है और चलता है। पवन सिंह की लोकप्रियता ठाकुरों में,मुसलमानों में,कायस्थों में ब्राह्मणों में,यादवो में,हरिजनों में, गजब की लोकप्रियता है,एक ऐसा नाम जो बिना पद के गजब की लोकप्रियता हासिल किए हुआ है,यदि पवन सिंह को कांग्रेस पार्टी टिकट देती है तो गोरखपुर की सीट बहुत कांटे की टक्कर होने वाली है।

युवाओं की पहली पसंद है-“पवन सिंह”

जब हमारे संवाददाता ने बहुत से नौजवानों से इस बारे में राय पूछी तो अधिकतम लोगो ने पवन सिंह के साथ रहने और चलने की बात कही। सीएम योगी आदित्यनाथ भी पहली बार 26 की उम्र में ही गोरखपुर के सांसद बने।

क्यो मिलना चाहिए युवाओ को टिकट …

भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. भारत के मुकाबले चीन, अमेरिका बूढ़ों के देश हैं. चीन में केवल 20.69 करोड़ और अमेरिका में 6.5 करोड़ युवा हैं. हमारे यहां 125 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं. इन की उम्र 19 से 35 वर्ष के बीच है. लेकिन देश के नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में तीनचौथाई नेता सीनियर सिटीजन की श्रेणी वाले हैं. राजनीतिक संगठनों में भी युवाओं से अधिक बूढे़ नेता पदों पर आसीन हैं.

मौजूदा संसद में 554 सांसदों में 42 साल से कम उम्र के केवल 79 सांसद हैं. इन की आवाज संसद में न के बराबर सुनाई पड़ती है. युवाओं की अगुआई कहीं नजर नहीं आती. उन की ओर से कहीं कोई सामाजिक, राजनीतिक बदलाव या किसी क्रांति की हुंकार भी सुनाई नहीं पड़ रही है.

देश के आम युवाओं की बात करें तो उन का हाल यह है कि वे भेड़ों की तरह हांके जा रहे हैं. चारों ओर युवाओं की केवल भीड़ है. हताश, निराश और उदास युवा. एसोचैम के अनुसार, आज 78 करोड़ युवा सोशल मीडिया पर तो सक्रिय हैं पर उन में राजनीतिक व सामाजिक रचनात्मकता नदारद है.

देश में नई चेतना का संचार करने वाली युवा राजनीतिक पीढ़ी कहीं नहीं दिखाई दे रही है।एक दौर था युवा नेताओं का ।

शो पीस बन कर रह गए हैं युवा नेता

राजनीति में युवाओं को आगे लाने की बात होती है, युवा नेतृत्व की बात चलती है पर पार्टी या सरकार का नेतृत्व किसी बड़ी उम्र के नेता को ही सौंपा जाता है.

पिछले लोकसभा चुनावों में युवाओं का चुना जाना अच्छा संकेत था पर ये युवा ज्यादातर अपनी खानदानी विरासत संभालने आए. कुछ बंधनों को छोड़ दें तो इन युवाओं में जोश और जज्बा तो नजर आता है पर नई सोच नहीं. विचारों में क्रांति लाने का काम नहीं हो रहा है. संसद में सचिन तेंदुलकर जैसे युवा केवल शोपीस बने हुए हैं. वे न खेलों को भ्रष्टाचार, बेईमानी से मुक्त करने के लिए कोई बात करते हैं, न किसी अन्य सुधार की।
यह बात भी सही है कि सत्ता की ओर से युवाओं को बदलाव की चेतना, आंदोलन से दूर रखने और इन आंदोलनों को कमजोर करने की योजनाबद्ध कोशिशें हुईं और उसे काफी हद तक कामयाबी भी मिली है. असल में मौजूदा व्यवस्था युवाओं की बेचैनी, उस के जोश, उस की क्रिएटिविटी को कुचलने का काम कर रही है. भीड़ की सोच ही युवाओं की सोच बनती जा रही है. युवा पीढ़ी अतीत की जंजीरों की जकड़न उतार फेंकने में हिचकिचा रही है

युवा आजादी का लुत्फ उठा रहे हैं. युवाओं ने मान लिया है कि अब उन की देश, समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है. आजादी ही हमारा लक्ष्य नहीं था. वास्तविक जिम्मेदारियां तो बाद में शुरू हुई हैं. गांधी, नेहरू के बाद देश को बहुत सुधारों की जरूरत है. देश संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. हमारे नेता सोच रहे हैं कि देश में सड़कें,

पुल, हाईवे, मौल, मैट्रो, मोबाइल फोन, कंप्यूटर जैसी चीजें तरक्की की निशानिया हैं. भ्रष्टाचार, निकम्मापन, बेरोजगारी, व्यक्ति की आजादी, धार्मिक, जातीय, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वासों से मुक्ति, नौकरशाही में कर्तव्य का अभाव, सरकार की जवाबदेही जैसी चीजों में बड़े सुधारों की जरूरत है.

अफसोस इस बात का है कि युवा तर्क नहीं कर रहा, सवाल नहीं उठा रहा कि विकास कहां है, कैसा विकास हो रहा है? बस, हां में हां मिलाए जा रहा है.

युवा वर्ग की पहचान है उस की बेचैनी, उस का आक्रोश, उस की सृजनात्मकता और स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाला उस का मिजाज. यही मिजाज उसे बदलाव के लिए व्यवस्था से टकराने का हौसला व हर जोखिम उठाने का साहस देता है.

जेल भेज दिया जाता है युवाओं को

पिछले दिनों पवन सिंह, कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी ,चंद्रशेखर जैसे युवा नेता उभर कर सामने आए. इन में व्यवस्था में बदलाव का जज्बा दिखाई दिया. ये नेता व्यवस्था से टकराए. इन्होंने भेदभाव, आजादी, बेरोजगारी, असमानता जैसे अहम मुद्दों को ले कर आंदोलन का नेतृत्व किया पर व्यवस्था से टकराने पर उन्हें जेल व जलालत मिली.

अपवादों को छोड़ दें तो पूरे देश में युवा समुदाय में वह बेचैनी, गुस्सा और आंदोलन दिखाई नहीं दे रहा है जिस के लिए उसे जाना जाता है.

युवा मोबाइल, इंटरनैट, सोशल मीडिया में इतना व्यस्त है कि उसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा. युवा किसी भी देश व समाज के कर्णधार माने जाते हैं. वे वह स्तंभ कहलाते हैं जिस पर समाज की मजबूत इमारत का निर्माण होता है. एक आम मानसिकता यह है कि 10वीं की पढ़ाई के बाद इंटर और फिर ग्रेजुएशन किया जाए. शिक्षा के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति भयावह दिखती है.

आज 47 प्रतिशत युवा रोजगार के लिहाज से नाकाबिल हैं. 35 प्रतिशत स्नातक क्लर्क की नौकरी के लायक हैं. कुल मिला कर 15 प्रतिशत युवा ही बेहतर रोजगार के स्तर तक पहुंच पाते हैं. विश्व के 200 विश्वविद्यालयों में भारत की उपस्थिति भी नहीं है.

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