Saturday, July 24, 2021

‘मथुरा-काशी बाकी है’: 1947 का वो यज्ञ जब 3 दोस्तों ने खींचा हिंदुओं के 3 पवित्र स्थल को वापस पाने का खाका…

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यह तो पहली झाँकी है, मथुरा-काशी बाकी है। ये नारा तो बहुत बाद में बुलंद हुआ। उससे बरसों पहले तीन दोस्तों ने अयोध्या के साथ-साथ इन दो हिंदू पवित्र स्थलों को वापस पाने का एक विस्तृत खाका तैयार कर लिया था। हालाँकि राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए पहले से ही संघर्ष जारी था। पर इनकी योजना की वजह से आजाद भारत में यह सिरे चढ़ा।

5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के बाद फिर से मथुरा-काशी को वापस पाने की बातें जोर-शोर से होने लगी है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए तो बकायदा एक ट्रस्ट भी बनाया गया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट से 14 राज्यों के 80 संत-महामंडलेश्वर जुड़े हैं। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई गई है।

असल में हिंदुओं के इन पवित्र स्थलों को वापस पाने की योजना एक खेल से भी जुड़ी हुई है। यह खेल है 12वीं सदी में उत्तरी फ्रांस से शुरू हुआ ‘जिउ दी पौमे’ (हथेली का खेल), जो 16वीं सदी में इंग्लैंड पहुँच टेनिस हो गया। 78 फीट लंबे और 27 फीट चौड़े कोर्ट में खेले जाने वाले लॉन टेनिस को अंग्रेज 1880 के दशक में हिंदुस्तान लेकर आ गए थे। 1920 आते-आते भारत ने डेविस कप में भाग लेना भी शुरू कर दिया था। हालाँकि भारतीय लॉन टेनिस का इतिहास भले 100 साल से भी पुराना हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने वाले हम चुनिंदा खिलाड़ी ही पैदा कर पाए हैं।

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लेकिन, इस खेल ने हिंदू जीवन दर्शन के तीन पैरोकारों को इतनी प्रगाढ़ता से जोड़ा कि इसने आजाद भारत में अयोध्या के राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव डाल दी। ये तीन दोस्त थे, बलरामपुर स्टेट के महाराजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह, नाथपंथी कनफटा साधुओं की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के अधिकारी केकेके नायर। महाराजा घुड़सवारी और लॉन टेनिस में पारंगत थे। महंत लॉन टेनिस के माहिर और नायर का भी इस खेल से लगाव था।

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महाराजा हिंदू जीवन दर्शन के प्रचार-प्रसार को समर्पित थे। महंत तो बकायदा हिंदू महासभा के अधिकारी ही थे। नायर भी हिंदू महासभा के संपर्क में थे। लेकिन, कहते हैं कि तीनों की दोस्ती का आधार लॉन टेनिस के प्रति इनका लगाव ही था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है कि 1947 के शुरुआती दिनों में महाराजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। केरल के एलप्पी के रहने वाले नायर जो 1930 में सिविल सर्विस से जुड़े थे, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे। यज्ञ में महाराजा के गुरु स्वामी करपात्री जी भी शामिल हुए।

अंजुल भर भिक्षा लेने के कारण करपात्री कहलाए स्वामी जी सिद्ध दंडी संन्यासी, उद्भट विद्वान और प्रखर वक्ता थे। ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ नामक बहुचर्चित किताब उनकी ही लिखी है। 1940 में बनारस में हिंदू परंपराओं की रक्षा के लिए उन्होंने ‘धर्मसंघ’ की स्थापना की और 1941 में बनारस से दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ शुरू किया। राजनीति में धर्म को उचित स्थान दिलाने के लिए ‘रामराज्य परिषद’ बनाया। 1951 में इस परिषद के 24 सदस्य राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए थे। कई लोग इस राजनीतिक दल के बैनर तले संसद भी पहुॅंचे।

शर्मा के मुताबिक उन्हें खुद स्वामी करपात्री ने बताया था कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव उसी यज्ञ में पड़ी थी। नायर वहाँ पहले से थे और यज्ञ समाप्ति से एक दिन पहले महंत दिग्विजय नाथ भी पहुँच गए। उन हिंदू धर्म स्थलों की मुक्ति पर चर्चा हुई, जिन पर इस्लामी अक्रांताओं ने कब्जा किया था।

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इसके बाद नायर एक विस्तृत योजना के साथ स्वामी करपात्री और महंत दिग्विजय नाथ से मिले। उन्होंने अयोध्या के साथ-साथ वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दोबारा हासिल करने का खाका पेश किया। नायर ने वादा किया कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। नौकरी भी।

संयोग से 1 जून 1949 को नायर फैजाबाद के कलेक्टर बने। वहाँ सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास पहले से ही राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए प्रयासरत थे। मैथिल ब्राह्मण अभिराम दास नागा वैरागी यानी रामानंद संप्रदाय के 15 साल पुराने खाड़कू थे। हिंदू महासभा से जुड़े होने के कारण महंत दिग्विजय नाथ के करीबी थे। उनकी ख्याति राम जन्मभूमि के ‘उद्धारक’ के तौर पर थी। कहते हैं कि 3 दिसंबर 1981 को जब अभिराम दास की अंतिम यात्रा निकली तो ‘राम नाम’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’ की गूँज हर ओर से आ रही थी।

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नायर के फैजाबाद में तैनाती के कुछ महीने बाद ही 22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात रामलला भाइयों के साथ विवादित गुंबद के भीतर प्रकट हुए। नायर ने उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दबाव के बावजूद मूर्तियों को हटाने से इनकार कर दिया था। 1952 में जब फैजाबाद से उनका तबादला कर दिया गया तो उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी।

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