Tuesday, August 3, 2021

यह है गोरखपुर का बुढि़या माई मंदिर ,जाने क्या है इतिहास…

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बुढि़या माई मंदिर गोरखपुर मुख्यालय से पूरब लगभग 10 किलोमीटर दूर कुसम्हीं जंगल में स्थित है। वहा जाने के लिए विश्वविद्यालय चौराहे से कसया की तरफ जाने वाली किसी भी सवारी गाड़ी से पहुंचा जा सकता है। कसया रोड स्थित विनोद वन के सामने मंदिर के मुख्य गेट से कुसम्ही जंगल में लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

यह है इतिहास

किवदंतियों के अनुसार पहले यहां बहुत घना जंगल था जिसमें एक नाला बहता था। नाले पर लकड़ी का पुल था। एक बारात आकर नाले के पूरब तरफ रुकी। वहां सफेद वस्त्रों में एक बूढ़ी मां बैठी थी, उसने नाच मंडली से नाच दिखाने को कहा। नाच मंडली बुढि़या मां का मजाक उड़ाते हुए चली गई। लेकिन जोकर ने बांसुरी बजाकर पांच बार घूमकर नाच दिखा दिया। बुढि़या माई ने प्रसन्न होकर जोकर को आगाह किया कि वापसी में तुम सबके साथ पुल पार मत करना। तीसरे दिन बारात लौटी तो वही बुढि़या पुल के पश्चिम तरफ मौजूद थी। बारात जब बीच पुल पर आई तो पुल टूट गया और पूरी बारात नाले में डूब गई। केवल जोकर बचा जो बारात के साथ नहीं था। इसके बाद बुढि़या माई अदृश्य हो गई। मरने से बचे इकलौते जोकर ने इस बात का खुलासा किया। तभी से नाले के दोनों तरफ का स्थान बुढि़या माई के नाम से जाना जाता है। बुढि़या माई का मंदिर नाले के दोनों तरफ बना है।

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मंदिर की विशेषता

बुढि़या माई मंदिर कसया रोड पर कुसम्हीं जंगल में स्थित है। मा के दो मंदिर हैं, दोनों के बीच में एक प्राचीन नाला बहता है। जब पानी रहता है तो यहां नाव के सहारे लोग उस पार जाते हैं। प्राकृतिक परिवेश में स्थित मां के दरबार में सबकी मन्नतें पूरी होती हैं। नवरात्र में नेपाल व बिहार से भी बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ सिर झुका हो तो सामने खड़ी मौत भी टल जाती है। मंदिर बनने के पूर्व वहां केवल पिंडी थी।

मंदिर के पुजारी बाबा राजेंद्र महाराज का कहना है कि श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ के मद्देनजर विशेष व्यवस्था की गई है। सुरक्षा व सुविधा का ध्यान रखा जाता है। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। पेयजल की पूरी व्यवस्था है।

श्रद्धालु गुड़िया का कहना है कि मैं बेतियाहाता गोरखपुर से आई हूं। प्रतिवर्ष नवरात्र में यहां आकर मां का दर्शन-पूजन करती हूं। मां की कृपा सभी भक्तों पर बरसती रहती है। कोई भी दरबार से खाली हाथ नहीं लौटता।

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