Monday, September 21, 2020

विशेषज्ञों की राय, जोखिम भरा होगा रेलवे का निजी हाथों में जाना….

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पूर्वोत्तर रेलवे के विशेषज्ञों ने कहा है कि रेलवे यदि निजी हाथों में जाएगा तो जोखिमभरा निर्णय होगा। इसके लिए सतर्कता जरूरी है।

पूर्वोत्तर रेलवे के पूर्व मुख्य परिचालन प्रबंधक राकेश त्रिपाठी का कहना है कि यह बजट महत्वाकांक्षी प्रतीत होता है। जहा तक पीपीपी मॉडल के जरिये रेलवे के विकास एवं आधुनिकीकरण का विषय है इसमें भी अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी। जहा तक रेलवे से संबंधित व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कार्यकलापों का प्रश्न है, इनको निजी हाथों में सौंपने में भले बहुत ज्यादा परेशानी न हो, परंतु पीएसयू सहित रेलवे के ऑपरेशन एवं संरक्षा संबंधी विषयों (जिनमें गहन अनुभव और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है) को निजी हाथों में सौंपना रिस्की भी साबित हो सकता है।

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वित्त मंत्री ने स्वच्छ, सुरक्षित एवं समयबद्ध ट्रेन संचलन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अपने भाषण में कहा कि हमारा लक्ष्य रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रासफॉर्म का है। उन्होंने एलान किया कि सरकार रेलवे में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है और इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए रेलवे के विकास के लिए पीपीपी मॉडल को लागू किया जाएगा।

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इतनी पड़ेगी आवश्यकता

अगले 12 वषरें में 2030 तक रेल ढंाचे के विकास के लिए 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता पड़ेगी, जिसे पीपीपी मॉडल से ही संचित करने की योजना है। वित्तमंत्री ने बताया कि डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का कार्य पूरा हो जाएगा, लेकिन जब तक एक्सप्रेस ट्रेनों के लिए समुचित टर्मिनल का विकास नहीं होगा तबतक समयबद्ध संचलन दुरुस्त करना संभव नहीं है।

पीपीपी मॉडल के लिए निजी क्षेत्र की वित्तीय विवशता जनहित में, तालमेल जरूरी

पूर्वोत्तर रेलवे के पूर्व वित्त सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी डॉ. राम चंद्र राय का कहना है कि वर्ष 2019-20 के केंद्रीय बजट में विभिन्न अवस्थापना संबंधी परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने पर जोर है। भारतीय रेलवे भी इसका अपवाद नही है। इसकी मुख्य परियोजनाओं को पीपीपी यानी निजी-सार्वजनिक भागीदारी से धन की व्यवस्था करने की स्वीकृति प्रदान की गई है। दुर्भाग्यवश भारतीय रेलवे पिछले 10 वर्ष से इस मॉडल को लागू करने का प्रयास कर रहीं है, लेकिन अभी तक इसका समुचित उपयोग नहीं कर पाया है। इसका पेशेवर उपयोग करके मालगाड़ियों के लिए अलग मार्ग, तीब्र गति से चलने वाली गाड़ियों के लिए अलग मार्ग, कोच, डिब्बा तथा इंजन बनाने के फैक्ट्रियों को बनाने के साथ साथ ट्रेनों का परिचालन कर सकता है और कुछ महत्वपूर्ण सेवाएं निजी क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी वातावरण में और कम मूल्य पर प्रदान कर सकता है। समस्या रेल अधिकारियों के सोच एवं पेशेवर समझ में फलदायक परिवर्तन न हो पाना है। अभी भी संबंधित अधिकारी पीपीपी प्रस्तावों को नौकरशाही अंदाज में देखते हैं। अगर हम निजी क्षेत्र की वित्तीय विवशता एवं जनहित में तालमेल बैठा सकें और पारदर्शी करार करके उसका प्रबंधन कर सके तो पीपीपी मॉडल द्वारा भारतीय रेलवे का कायाकल्प सम्भव है।

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