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Friday, June 5, 2020

समाजवादी पुरोधा डॉ राम मनोहर लोहिया की अहिंसा दृष्टि – प्रोफेसर डॉ योगेन्द्र यादव

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Gorakhpur Times | गोरखपुर टाइम्स

(महावीर जयंती पर विशेष )
जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी ने न केवल जैन धर्म की स्थापना की। बल्कि अहिंसा पर विशद चिंतन मनन कर उसे मानव जीवन के लिये उपयोगी भी बनाया । इसी कारण जब जैन धर्म ग्रन्थों का अध्ययन अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में करते हैं, तो उसमें मैत्री, करुणा और अनुकंपा जैसे शब्द भी प्राप्त होते हैं। जिनका व्यापक अर्थ है, जो मानव जीवन के लिए भी बड़े उपयोगी जान पड़ते हैं। इसी कारण महावीर जैन द्वारा प्रतिस्थापित अहिंसा पूरी तरह से सकारात्मक है। जिसका अर्थ प्रकृति, पर्यावरण को अक्षुण्य बनाए रखते हुए मानव जीवन का अधिकतम कल्याण है। स्वामी महावीर जैन का मानना है कि अहिंसा मनुष्य की जीवन यात्रा के साथ विकसित होती और जैसे-जैसे उसका हृदय करुणा से आप्लावित होता जाता है, उसमें मैत्री का भाव जागृत होता है। जिसके फलस्वरूप उसमें सर्वे भवनतु सुखिन: का भाव आ जाता है। महावीर जैन का साफ कहना है कि जब तक मानव में जगत ही नहीं, सर्व कल्याण जिसमें समस्त जीव, प्रकृति और पर्यावरण भी शामिल है, की भावना नहीं आ जाती, तब तक अहिंसा धर्म का पालन संभव नहीं है। उन्होने सदियों पहले ही आगाह कर दिया था, अगर मनुष्य मेरे द्वारा प्रतिपादित अहिंसा यानि सर्व कल्याणक भावना से आप्लावित नहीं होता, तो मनुष्य जीवन को नित्य नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। जैसा कि आज मनुष्य के सामने अनेक चुनौतियाँ खड़ी हैं। ग्लोबल वार्मिंग की बात छोड़ ही दें, इस समय एक वायरस कोरेना के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक दिखाई पड़ रही है। इसी कारण जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी ने मनुष्य को अपना जीवन अपरिग्रही बनाने को कहा। उतना ही भोग भोगने को कहा, जिससे जीवन यापन हो सके। अन्यथा पारिस्थकीय संतुलन बिगड़ जाएगा और अन्य सभ्यताओं की तरह वर्तमान मानव सभ्यता भी समाप्त हो जाएगी।
वर्तमान युग आर्थिक युग है। जिसे देखो वही अर्थ के पीछे भाग रहा है । इसलिये डॉ राम मनोहर लोहिया पर आने के पहले अहिंसक अर्थ व्यवस्था को समझ लेते हैं। तभी पाठकों को लोहिया की अहिंसक दृष्टि समझ में आएगी । जब हम महावीर जैन और उनकी अहिंसा की बात करते हैं, तो एक बात तय हो जाती है कि जब भी हम अहिसक अर्थ व्यवस्था की बात करेंगे, उसके पहले हमें अहिंसक समाज की बात भी करनी पड़ेगी । इसी कारण अहिंसक अर्थ व्यवस्था के अंतर्गत अहिंसक समाज ने प्रकृति और मनुष्य के द्वैत भाव को अस्वीकार कर दिया । यानि प्रकृति और मनुष्य दोनों एक जैसे ही हैं। जैसे ही हम इस पहलू को स्वीकार करते हैं, तो अपरिग्रह का भाव आ जाता है। यानि प्रकृति प्रदत्त भोगों का उपयोग सिर्फ जितना जीवन यापन के लिए जरूरी है। उतना ही करना है। इसके लिए महावीर स्वामी अहिंसक समाज के लिए शारीरिक श्रम की बात दृढ़ता के साथ कही और विकेन्द्रीकरण को प्रमुखता प्रदान कर दिया । इससे स्पष्ट हो गया कि अहिंसक अर्थव्यवस्था में मनुष्य अपने सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए सर्वजन के हित की बात का चिंतन करेगा । महात्मा गांधी, विनोबा भावे ने आगे चल कर इनका प्रयोग किया और इन लोगों ने इस संबंध में साफ-साफ कहा कि अहिंसक अर्थव्यवस्था का मूल स्रोत भारतीय जीवन दर्शन और उससे प्रभावित समाज व्यवस्था ही है ।
समाजवाद की उत्पत्ति पश्चिम के औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप हुआ । इस दौरान उद्योगपति पूँजीपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण किया जाता था। तत्कालीन प्रबुद्धवर्ग का मानना था कि उद्योग को चलाने और उससे लाभ कमाने में श्रमिकों का असीमित योगदान होता है। इसलिए श्रम को भी पूंजी के रूप में स्वीकार करना चाहिए । महावीर स्वामी की जयंती और समाजवादी पुरोधा डॉ राम मनोहर लोहिया आज सुबह से ही दिमाग में घूम रहे हैं। सुबह चार बजे उठ कर ही लोहिया की किताबें उठाई, उन्हे पढ़ना शुरू किया। इतना तो पता ही था कि डॉ राम मनोहर लोहिया या समाजवाद में जो अहिंसा की रुष्टि है, वह महावीर स्वामी से शुरू होकर पहले महात्मा गांधी के प्रयोग में आई। इसके बाद जो उसका व्यावहारिक पक्ष उभरा, उसी का अनुपालन अपने दर्शन में डॉ राम मनोहर लोहिया ने किया है । डॉ लोहिया भी महात्मा गांधी की ही तरह सक्रिय अहिंसा में विश्वास करने वाले थे । जो अहिंसा कमजोरी की अभिव्यक्ति नहीं, शक्ति और संबल की द्योतक थी । इसी कारण उन्होने सविनय अवज्ञा करने वाले लोगों से कहा कि जालिम के सामने घुटने नहीं टेकना, लेकिन उनकी गार्डन भी नहीं काटना । जबकि महावीर स्वामी ने इस प्रकार के अहिंसा की बात नहीं की । उनकी अहिंसा तो इस तरह के कृत्य करने के ही खिलाफ थी।
डॉ राम मनोहर लोहिया में भारत छोड़ो आंदोलन के समय उनकी अहिंसा का स्वरूप कुछ और निखरा हुआ जान पड़ता है। डॉ लोहिया और उनके तमाम समाजवादी समर्थक इस बात का संकल्प लेकर भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेते हैं कि वे महात्मा गांधी के दिशा-निर्देश के अनुसार सरकारी व्यवस्था का ध्वंस तो करेंगे, लेकिन न किसी की हत्या करेंगे, और न ही किसी को शारीरिक चोट पहुंचाएंगे । लोहिया ने आगे कहा कि हिंसा मत करो, लेकिन अगर उससे काम नहीं बनता हो तो संगठित होकर चाहे आकाशवाणी हो, शस्त्रागार हो, सचिवालय हो, उस पर कब्जा कर लो। व्यवस्था को तोड़ना हिंसा नहीं है, मनुष्य की हत्या करना हिंसा है। इसी कारण स्माजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने व्यवस्था के खिलाफ जम कर आंदोलन किए।
डॉ राम मनोहर लोहिया की अहिंसा में दो तत्व दिखाई पड़ते हैं – निहत्थापन और प्रतिरोध । उनका मानना था कि ये दोनों गुण समान रूप से लागू होना चाहिए । इसलिए जब भी कोई आंदोलन करना हो, तो पूरी मानसिक तैयारी के साथ करना चाहिए । अगर प्रतिरोध कमजोर पड़ा, तो निहत्थापन कायरता का प्रतीक माना जाएगा । जिससे आगे लोग हथियारों का उपयोग करने लगेगे। जो पूरी तरह से अनुचित है । लोहिया रचनावली में एक प्रसंग का इस संदर्भ में उपयोग करना समीचीन होगा । उन्होने गांधी जी का उद्धरण देते हुए लिखा है कि 1916 में महात्मा गांधी ने कहा था कि मेरा देश कार्यरता और पौरुषहीनता के कारण मार्शल लॉं के सामने झुकने के बजाय अगर कोई वाइसराय की हत्या करेगा, तो मैं उसे पसंद करूंगा । महात्मा गांधी के इस उद्धरण का लोहिया की अहिंसा दृष्टि पर बहुत व्यापक असर पड़ा । इसी कारण वे मानते थे कि कायरता और पौरुषहीनता अहिंसा के कभी आधार नहीं बन सकते । लोहिया ने लोकसभा में बस्तर के राजा प्रवीरचंद भंजदेव की हत्या पर बोलते हुए कहा था कि हिंसा का एक खास गुण होता है कि वह अपने से कमजोर शत्रु खोजती है।अपने से बलवान विरोधी से वह पिट जाती है। मैं हिंसा को नापसंद करता हूँ ।
लोहिया की अहिंसा दृष्टि क्या है ? भारत छोड़ो आंदोलन के बाद जब वे गिरफ्तार होकर जेल में डाल दिये जाते हैं, तब पता चलती है । जेल के अंदर उन्हें घोर यातनाए दी गई, लेकिन वे नहीं टूटे । उन्हें जंजीरों में जकड़ कर कोठारी के बाहर ला कर बिना हिले डुले दफ्तर में बैठने का आदेश दिया जाता । लेकिन उन्होने कभी उफ नहीं की। बाद में उन्हें रात दिन सोने नहीं दिया गया, इसके बाद भी उनका मुंह खुलवाने में अंग्रेज़ कामयाब नहीं हुए । इस प्रकार की यातना देने की वजह से उनकी शारीरिक प्रतिरोध क्षमता धीरे धीरे समाप्त हो रही थी। लेकिन इसके बावजूद भी जब उनके सामने महात्मा गांधी को गाली दी गई, तो जंजीरों में जकड़े होने के बावजूद, घोर यातना देने के बाद बावजूद, उनका दिमाग सक्रिय हो उठा और उन्होने जेल अधिकारी को शटअप कहा । इसके बाद उन्हे और अधिक यातना दी जाने लगी। उन्हे एक हजार वाट के बल्ब के करीब ले जाकर बांध दिया गया। लेकिन फिर भी लोहिया अपने इरादे से नहीं डिगे, उन्होने उफ तक नहीं की।
डॉ राम मनोहर लोहिया की अहिंसक दृष्टि ऐसी थी कि वे सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखते थे । एक बार की बात है कि सरदार वल्लभभाई पटेल के गृह मंत्रालय ने डॉ लोहिया पर यह आरोप लगाया कि वे नेहरू मंत्रिमंडल को अस्थिर करना चाहते हैं। इसकी शिकायत सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से की। महात्मा गांधी ने लोहिया से पूछा तो उन्होने लिखित जवाब दिया – मैं जरूर इस मंत्रिमंडल को निकम्मा मानता हूँ, और इसे खत्म करना चाहता हूँ, लेकिन इसके लिए हिंसा की बात कभी सोच नहीं सकता । मेरे ऊपर इस प्रकार का आरोप लगाना किसी की घिनौनी साजिश है । इस प्रकार हम देखते हैं कि डॉ राम मनोहर लोहिया की अहिंसा दृष्टि इतनी व्यापक है कि राजनीति में भी उन्होने इसके लिए उच्च मापदंड स्थापित किया। वे मंत्रिमंडल को भी अस्थिर करना चाहते हैं, लेकिन वह भी अहिंसक मार्ग से । आगे जब-जब मुलायम सिंह यादव ने भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार बनाई, तब तब उन्होने भी उनके इन्हीं अहिंसक दृष्टि का उपयोग किया । इसी कारण आज भी देश के तमाम युवाओं को लोहिया का समाजवादी दर्शन आकर्षित करता है। क्योंकि उनकी अहिंसक दृष्टि समन्वित समाजवादी दर्शन समाजवादी राज्य को सशक्त करने के लिए जनता को सशक्त बनाना चाहता है। समाजवादी सरकारों को समृद्धिशाली बनाने के लिए जनता को समृद्धिशाली बनाना चाहता है।

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प्रोफेसर डॉ योगेन्द्र यादव
पर्यावरणविद, शिक्षाविद, भाषाविद,विश्लेषक, गांधीवादी /समाजवादी चिंतक, पत्रकार, नेचरोपैथ व ऐक्टविस्ट

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