Saturday, September 25, 2021

यूपी: इस गांव में एक अनूठी परंपरा, मौत के बाद पड़ोस के लोग करते हैं ये काम

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खुशखबरी:-सहजनवा दोहरीघाट रेलवे ट्रैक को मंजूरी 1320 करोड़ स्वीकृत

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हिंदू समाज में यह सामान्य परंपरा है कि किसी के निधन पर आस-पड़ोस के लोग शव के लिए कफन जरुर देते हैं। इसे सामाजिक जुड़ाव और प्रभाव से भी जोड़कर देखा जाता है। शव के लिए आसपास के लोगों से कफन न मिलने पर कई पुरानी धारणाएं और कहावतें भी प्रचतिल हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में कुछ गांव ऐसे हैं, जहां लोग शव को कफन नहीं देते।
पुरानी परंपराओं और धारणाओं को तोड़ते हुए यहां के लोग समाज को एक नया संदेश दे रहे हैं। खास बात यह कि यह गांव उन लोगों के हैं, जहां लोग कम पढ़े-लिखे हैं, मगर उनकी सोच उन्हें शिक्षित लोगों से भी अलग कर रही है।

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केराकत तहसील क्षेत्र के ग्राम हुरहुरी, चौकिया, डेड़ुवाना, बरौटी, बिशुनपुर लेवरुवा, अइलिया, अमिलिया, मुरखा, कनौरा आदि गांवों की अनुसूचित जाति के लोगों में यह परंपरा सामान्य हो चुकी है। बस्ती के कुछ जागरुक व शिक्षित लोगों ने इसकी पहल की और फिर हर कोई इसे स्वीकार कर चुका है।

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गांव में किसी भी परिवार में निधन होने पर कफन देने की बजाए लोग उन्हें आर्थिक मदद करते हैं। इससे यह होता है कि पीड़ित की आर्थिक मदद हो जाती है। वह उन पैसों को अन्य जरूरी काम में खर्च कर लेता है।

चौकियां गांव निवासी साहब लाल जायस बताते हैं कि इन गांवों में ज्यादातर लोग गरीब मजदूर हैं। मजदूरी के जरिए ही जीवन-यापन करते हैं। ऐसे में अचानक से किसी के निधन पर पैसे की व्यवस्था कर पाना मुश्किल होता है।

कई बार ऐसे परिवार देखे गए, जिनके पास शव को घाट तक ले जाने और लकड़ियां खरीदने के पैसे नहीं थे। इसके बाद सभी लोगों ने मिलकर यह फैसला लिया। पिछले एक वर्ष से यह परंपरा चल रही है। पप्पू कुमार भारती बताते हैं कि शव के लिए एक ही कफन पर्याप्त है।

आस-पड़ोस के लोगों, रिश्तेदारों या समाज के अन्य लोगों की ओर से दिए जाने वाले कफन को श्मशान घाट पर उतारकर फेंक दिया जाता है या जला दिया जाता है। इससे किसी का लाभ नहीं होता, सिर्फ पैसे बर्बादी होती है। लिहाजा हम लोग आर्थिक मदद कर देते हैं।

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विशुनपुर लेवरुवा के आनंद कुमार, डेडुवाना के शिक्षक करमदेव राम आदि भी अपने गांवों में इस परपंरा का निर्वहन करा रहे हैं। उनका कहना है कि कफन से न तो मृतक को लाभ होता है और न ही उसके परिवार को। उसके बदले दी जाने वाली राशि अंतिम संस्कार में काफी मददगार होती है।

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