Wednesday, August 4, 2021

क्या गोरखपुर, देवरिया,कुशीनगर आदि के किसानों के लिए उपयोगी है यह किसान बिल,आइये विस्तार से समझते हैं ….

गोरखपुर के नवोदित कलाकारो से सजी फ़िल्म ‘ऑक्सीजन ‘के अभिनव प्रयास की खूब हो रही चर्चा

नवोदित कलाकारों को लेकर डॉ. सौरभ पाण्डेय की फ़िल्म 'ऑक्सीजन 'के अभिनव प्रयास ने रचा इतिहास

बड़हलगंज के बाबा जलेश्वरनाथ मंदिर के पोखरे का 98.5 लाख से होगा सुन्दरीकरण।

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Maharajganj: प्राथमिक विद्यालय हो रहे मरम्मत कार्य में घटिया तरीके का किया जा रहा है प्रयोग

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Maharajganj: नालियों के टूट जाने और समय से सफाई न होने से लोग हो रहे परेशान, जांच कर सम्बन्धित कर्मचारियों पर होगी कार्रवाई –...

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Maharajganj: दबंग पंचायत मित्र द्वारा किया जा रहा है अवैध नाली का निर्माण।

महराजगंज- फरेंदा ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम सभा पिपरा तहसीलदार में पंचायत मित्र द्वारा अपने व्यक्तिगत नाली का निर्माण ग्राम सभा के मुख्य...

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कृषि संबंधी तीन विधेयकों को १४ सितंबर २०२० को संसद में प्रस्तुत किया गया, जिनका उद्देश्य था –

बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर परम प्रकाश से सत्य चरण लक्क़ी की बातचीत के आधार पर विवरण…

तालाबंदी के दौरान आये कृषि संबंधी अध्यादेशों को स्थानांतरित करना। कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश विधेयक २०२०, किसान (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अनुबंध विधेयक २०२०, आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक २०२०। आवश्यक वस्तु अधिनियम को लोकसभा ने पहले ही पारित कर दिया था. आज अन्य अध्यादेशों को भी संसद ने ध्वनिमत से पारित कर दिया. अब इन्हें राज्यसभा में प्रस्तुत किया जाएगा, जो सत्तापक्ष की संख्या और उसके प्रबंधन को देखते हुए अब एक औपचारिकता भर है, जहां पारित होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह क़ानून बन जाएगा.


किसान मज़दूर संघर्ष समिति ने पंजाब में २४ से २६ सितंबर तक तीन दिन का रेल रोक आंदोलन करने का निर्णय लिया है. उनका कहना है कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली खत्म हो जाएगी और किसान बड़े पूँजीपतियों की दया पर निर्भर हो जाएंगे. उल्लेखनीय है कि पंजाब और हरियाणा के किसान हफ़्तों से इन अध्यादेशों के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं. इसी क्रम में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में १० सितंबर २०२० को किसानों पर लाठीचार्ज भी किया गया था. पंजाब और हरियाणा में मंडियों की व्यवस्था सुदृढ़ है, इसलिए वे नए कानूनों को भविष्य में पारम्परिक मंडी विध्वंस का ज़रिया मानते हैं.


भाजपा के सबसे पुराने राजनीतिक गठबंधन दल शिरोमणि अकाली दल ने इसका भारी विरोध किया है और इस दल की एकमात्र कैबिनेट प्रतिनिधि हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया है, हालांकि उनकी पार्टी अभी भी केंद्र सरकार को बाहरी समर्थन दे रही है, जिसके लिए विपक्षी दल उन्हें दोहरेपन को लेकर लताड़ रहे हैं. सभी विपक्षी दलों ने संसद में इन अध्यादेशों का विरोध किया है.
चूँकि कृषि और बाजार राज्य विषय हैं, इसलिए इन अध्यादेशों को संविधान में निहित राज्यों के कार्यों और सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ प्रत्यक्ष अतिक्रमण के रूप में देखा जा रहा है. यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री बारम्बार ‘सहकारी संघवाद’ की माला जपते रहते हैं. केंद्र सरकार ने तर्क दिया है कि खाद्य पदार्थों में व्यापार और वाणिज्य समवर्ती सूची का हिस्सा हैं, इस प्रकार यह उसे संवैधानिक औचित्य प्रदान करता है।

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सरकार और कुछ अर्थशास्त्रियों द्वारा इन अध्यादेशों को कृषि और कृषकों के लिए क्रांतिकारी बताया जा रहा है. ज़ाहिर है, वर्तमान में ख़ालिस आक्रामक पूंजीवादी आर्थिक मॉडल पर चल रहा हमारा देश भी ब्राज़ील की तरह इसी दिशा में जाने को बाध्य है, जिसके कर्ता-धर्ता उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के त्रिक को हर मर्ज़ की एकमात्र दवा समझते हैं.
यह सब तब हो रहा है जबकि वर्तमान आर्थिक मॉडल की खामियां बारम्बार उजागर होती रही हैं, जिसमें अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है. इसे मुकेश अम्बानी अथवा गौतम अडानी के कोरोना काल में बढ़ते साम्राज्य और देश की जनता के पिसते जाने की नियति उदाहरण से समझा जा सकता है.

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बहरहाल, इन तीन अध्यादेशों के बारे में कुछ ज़रूरी तकनीकी बातों को जानना आवश्यक है.
आवश्यक वस्तुएं (संशोधन) अध्यादेश में आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को हटा दिया गया है। यह संशोधन इन खाद्य वस्तुओं के उत्पादन, भंडारण, संचलन और वितरण को नियंत्रण मुक्त कर देगा। केंद्र सरकार को युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा के दौरान आपूर्ति के विनियमन की अनुमति है; साथ ही ऐसे समय में निर्यातकों और संसाधकों को छूट प्रदान करने का भी प्रावधान है।


अध्यादेश यह आवश्यक प्रावधान करता है कि कृषि उपज पर किसी भी भंडारण सीमा को लागू करना मूल्य वृद्धि पर आधारित होना चाहिए। एक स्टॉक सीमा केवल तभी लगाई जा सकती है जब बागवानी उत्पादों के खुदरा मूल्य में 100% वृद्धि हो और गैर-विनाशशील खाद्य कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा मूल्य में 50% की वृद्धि हो.
खाद्य पदार्थों के नियंत्रण में ढील देने के संबंध में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा है कि यह निर्यातकों, संसाधकों और व्यापारियों को फ़सल के मौसम के दौरान फ़सल की जमाखोरी की ओर ले जाएगा, जब कीमतें आम तौर पर कम होती हैं, और कीमतें बढ़ने पर वे इसे बाद में जारी करेंगे। यह खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर सकता है क्योंकि राज्यों को राज्य के भीतर ही स्टॉक की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी नहीं होगी। इस अध्यादेश के आलोचकों ने अनिवार्य और बढ़ी हुई कालाबाजारी की कीमतों में अतार्किक अस्थिरता का अनुमान लगाया है।


कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश का उद्देश्य है – किसानों के लिए अधिसूचित कृषि उपज बाजार समिति (APMC) मंडियों के बाहर कृषि बिक्री और विपणन को खोलना, अंतरराज्यीय व्यापार बाधाओं को हटाना और कृषि उपज के इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के लिए एक तंत्र प्रदान करना। यह अध्यादेश राज्य सरकारों को एपीएमसी बाजारों के बाहर व्यापार शुल्क, उपकर या लेवी एकत्र करने से प्रतिबंधित करता है।
एपीएमसी को खरीदारों और विक्रेताओं के बीच उचित व्यापार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिससे किसानों की उपज का प्रभावी मूल्य दिया जा सके। एपीएमसी खरीदारों, कमीशन एजेंटों और निजी बाजारों को लाइसेंस प्रदान करके किसानों की उपज के व्यापार को विनियमित कर सकता है; इस तरह के व्यापार पर बाजार शुल्क या कोई अन्य शुल्क लगा सकता है; और व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए अपने बाजारों के भीतर आवश्यक अवसंरचना प्रदान करता है.

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आलोचक एपीएमसी के एकाधिकार के विघटन को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्न की सुनिश्चित खरीद को समाप्त करने के संकेत के रूप में देखते हैं। केंद्र के ‘एक राष्ट्र, एक बाजार’ आह्वान के लिए, आलोचकों ने ‘एक राष्ट्र, एक एमएसपी’ का आह्वान किया है। APMC जैसे राज्य तंत्रों को निरर्थक बनाने की बजाय बड़ी संख्या में किसानों का उनकी उपज के लिए एमएसपी प्राप्त करना और एपीएमसी की जटिलता को सुलझाना समय की माँग है.
कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अध्यादेश ‘अनुबंध कृषि’ से संबंधित है. यह कृषि उपज की बिक्री और खरीद के लिए व्यापार समझौतों पर एक तंत्र प्रदान करता है. कानून में परिकल्पित पारस्परिक रूप से सहमत पारिश्रमिक मूल्य ढांचे को किसानों की रक्षा करने और सशक्त बनाने वाले के रूप में पेश किया गया है।

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किसी भी कृषि उपज के उत्पादन से पहले दर्ज किया लिखित कृषि समझौता, खेत की उपज और सेवाओं की आपूर्ति, गुणवत्ता, ग्रेड, मानकों और कीमत के लिए नियम और शर्तों को सूचीबद्ध करता है। खरीद के लिए भुगतान की जाने वाली कीमत समझौते में उल्लिखित की जानी है। कीमतों के परिवर्तन के मामले में, समझौते में ऐसी उपज के लिए भुगतान किए जाने वाले गारंटीकृत मूल्य को शामिल किया जाना चाहिए। बोनस या प्रीमियम सहित गारंटीकृत मूल्य से अधिक किसी भी अतिरिक्त राशि के लिए प्रचलित कीमतों या किन्हीं अन्य उपयुक्त बेंचमार्क कीमतों से जुड़ा हुआ एक स्पष्ट संदर्भ भी शामिल होना चाहिए। गारंटीकृत मूल्य और अतिरिक्त राशि सहित इस तरह की कीमत निर्धारित करने की विधि, अनुबंध में अनुलग्नक के रूप में प्रदान की जाएगी।


मूल्य आश्वासन विधेयक, किसानों को मूल्य शोषण के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हुए भी मूल्य निर्धारण के लिए तंत्र को निर्धारित नहीं करता है। इसीलिए इस बात की आशंका है कि निजी कॉरपोरेट घरानों को दी जाने वाली खुली छूट से किसान का शोषण हो सकता है।
अनुबंध कृषि देश के किसानों के लिए एक नई अवधारणा नहीं है – खाद्यान्नों के लिए अनौपचारिक अनुबंध, गन्ना और पोल्ट्री क्षेत्रों में औपचारिक अनुबंध आम हैं। कृषि क्षेत्र की असंगठित प्रकृति और निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं के साथ कानूनी लड़ाई के लिए संसाधनों की कमी के कारण औपचारिक अनुबंध दायित्वों के बारे में आलोचक आशंकित हैं।

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