Sunday, June 13, 2021

मैरिटल रेप को यौन उत्पीड़न क्यों नहीं मानता है यह पितृसत्तात्मक समाज?

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महिला यौन उत्पीड़न ना केवल भारत देश में अपनी जड़ों को जमा चुका है, बल्कि विदेशों में भी अपनी पकड़ बनाए हुए है। इसके तहत एक नई सोच जो #मीटू के नाम से विख्यात हुई है, वह बाढ़ की तरह अपनी सीमाओं को लगातार लांघ रही है।

मीटू के तहत हर वह महिला या पुरुष जो अपने जीवन में यौन उत्पीड़न का शिकार हुए हैं, अपनी समस्याओं को जाहिर कर रहे हैं। #मीटू कहने को तो मात्र दो लफ्ज़ हैं मगर इन्हीं दो लफ्ज़ों के ज़रिये लाखों लोगों ने अपने साथ हुई यौन शोषण की बातें ज़ाहिर की हैं।

मीटू हमारे भारत देश की उपज नहीं है। यह अमेरिका की

मीटू हमारे भारत देश की उपज नहीं है। यह अमेरिका की गोद में जन्मा है, जो अब अपना विशाल रूप लेकर विश्व के हर कोने में अपना रुख बढ़ा चुका है।

अमेरिका में सबसे पहले हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने सेक्शुअली हैरेस होने की बात लिखते हुए कहा कि हर वह शख्स जो कभी भी यौन उत्पीड़न का शिकार हुआ हो, वह ट्वीट के कमेंट पर आकर #Metoo लिखे।

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वहीं से बढ़ता हुआ यह आज हमारे देश की सीमा तक आ पहुंचा। लाखों लड़के-लड़कियों ने इस हैशटैग के साथ अपनी बातें लिखीं। इस कैंपेन में ना सिर्फ आम लड़के-लड़की, बल्कि बॉलीवुड से लेकर टीवी कलाकारों तक ने लिखा।

क्या यह उत्पीड़न नहीं है?
सरकार ने 2013 में एक कानून बनाया था। इसके बाद कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 अस्तित्व में आया था मगर सवाल यह है कि क्या #मीटू कैम्पेन आगे बढ़ाने से महिला उत्पीड़न की समस्या हल हो गई? क्या उनके साथ हुआ यौन उत्पीड़न केवल वजह है? हज़ारों महिलाएं अपने ही घर में उत्पीड़न का शिकार होती हैं। क्या उनका इससे लेना देना नहीं है? क्या वह इसका हिस्सा नहीं?

हज़ारों महिलाएं शादी-शुदा होने बावजूद अपने ही पति की ज़बरदस्ती का शिकार होती हैं, क्या वह महिला उत्पीड़न नहीं है? वे महिलाएं बदनामी की वजह से चुप रहती हैं और इसे अपनी नियति मानकर अपना जीवन बीता देती हैं। हज़ारों माँएं अपने परिवार की ज़िद्द के कारण अपनी कोख से लड़की गिरा देती है, क्या यह उत्पीड़न नहीं है?

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हज़ारों महिलाओं को अपनी सास, ननद और पति के तानों और बुरे बर्ताव की वजह से आत्महत्या करनी पड़ती है, क्या यह महिला उत्पीड़न नहीं है? महिलाओं का अस्तित्व केवल चार दीवारी की शोभा बनकर रह गया है, क्या यह उत्पीड़न नहीं है? हमेशा की तरह यह सवाल भी उतने ही अधूरे हैं, जितने कि इनके जवाब।

भारत में लगभग हर महिला किसी ना किसी तरह से उत्पीड़न का शिकार होती है। शारीरिक कष्ट के साथ मानसिक यातनाएं झेलना भी महिला उत्पीड़न का ही हिस्सा है, जिससे महिलाओं को सुरक्षा दिलाना लगभग असंभव है। यह बात अलग है कि जिनकी पहुंच दूर तक होती है या जो अपने आप में खुद सक्षम होती हैं, वे पूरी दुनिया के सामने आने का दम रखती हैं।

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इसके अलावा हमारे देश में लगभग औसत आबादी ऐसी है, जो महिलाओं को ना केवल उत्पीड़न झेलने के लिए कहती है, बल्कि आजीवन उसका हिस्सा बनाकर रखती है। बातें सामने रखना और समस्या का निदान दो अलग हिस्से हैं।

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