Wednesday, September 29, 2021

Opinion: मोदी सरकार (BJP) की इच्छाशक्ति के उदाहरण

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खुशखबरी:-सहजनवा दोहरीघाट रेलवे ट्रैक को मंजूरी 1320 करोड़ स्वीकृत

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जनता इसे बड़े गौर से देखती है कि हमारे हुक्मरानों का सार्वजनिक धन के प्रति कैसा रवैया है ? वे लुटेरों को सजा देने -दिलाने की कोशिश करते हैं या बचाने की।

New Delhi, June 12: विजय माल्या के प्रत्यर्पण के सिलसिले में ताजा खबर यही है कि उसे भारत लाने में कुछ देर हो सकती है। इसके बावजूद उसका प्रत्यर्पण तय है और इसका कारण मोदी सरकार का रुख- रवैया है। हर सरकार की परख उसके रवैए से ही होती है। बोफोर्स सौदे में दलाली खाने वाले ओत्तावियो क्वात्रोचि और बैंकों के कर्जदार भगोड़े विजय माल्या के मामलों की मिसाल से यह एक बार फिर साबित होता है।

यह किसी से छिपा नहीं रहा कि क्वात्रोचि के प्रति कांग्रेस सरकारों का रुख कैसा रहा। वहीं यह भी पूरे देश ने देखा कि भगोड़े विजय माल्या के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार कैसा सलूक कर रही है।
यकीनन दोनों सरकारों के रुख में लोगों को भारी फर्क दिख रहा है। ये दो मामले देश की दो सरकारों की अलग -अलग शासन शैलियांे की बानगी पेश कर रहे हैं। लोगों में कांग्रेस से दुराव और भाजपा से लगाव की एक वजह यह भी है। यह अकारण नहीं कि कालांतर में भाजपा अपने सहयोगियों के साथ अपनी राजनीतिक एवं चुनावी स्थिति मजबूत करती गई। दूसरी ओर, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल एक तरह जनता से कटते गए। जनता इसे बड़े गौर से देखती है कि हमारे हुक्मरानों का सार्वजनिक धन के प्रति कैसा रवैया है ?

वे लुटेरों को सजा देने -दिलाने की कोशिश करते हैं या बचाने की।आम जन को तो यही लगा कि कांग्रेस ने कदम -कदम पर बोफोर्स सौदे और उसके दलालों को बचाया। दूसरी ओर, मोदी सरकार ने विजय माल्या के खिलाफ लंदन की अदालत में वर्षों तक लगातार केस लड़कर उसके प्रत्यर्पण की नौबत ला दी।माल्या जल्द ही भारत में होगा।उसने विभिन्न बैंकों के 9 हजार करोड़ रुपए गबन किए हैं।ये पैसे जनता के हैं।सरकारें इन पैसों की ट्रस्टी होती है।दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में सार्वजनिक धन की लूट व बंदरबांट की परिपाटी पुरानी है।इसी परंपरा से निकले माल्या जैसे शख्स ने पहले तो पूरी गारंटी दिए बिना बड़े कर्ज लिए और फिर उन्हें न लौटाने का मंसूबा बनाया।
कर्ज न लौटाने को लेकर उसने तमाम बहाने बनाए।परंतु जब मोदी सरकार और बैंकों ने उस पर शिंकजा कसा तो वह रकम लौटाने के लिए तो तैयार हो गया,मगर अब केवल इससे ही बात नहीं बनेगी।

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इसके विपरीत क्वात्रोचि को कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक बचाया।अंत में ऐसी स्थिति बना दी जिससे वह साफ बच निकला।परिणामस्वरूप 1989 मंे हुए आम चुनाव और उसके बाद के चुनावोें में कांग्रेस बहुमत के लिए तरस गई।बोफोर्स घोटाले ने मतदाताओं के मानस को इसलिए भी अधिक झकझोरा था,क्योंकि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला था।बोफोर्स घोटाला 1987 में उजागर हुआ था।उसक बाद से ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार के बयान बदलते रहे।
इसलिए आम लोगों ने समझा कि दाल में कुछ काला है।फिर मतदाताओं ने 1989 के चुनाव में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बेदाल कर दिया।फिर वी.पी.सिंह सरकार के राज में इस मामले में
प्राथमिकी दर्ज की गयी।स्विस बैंक की लंदन शाखा में स्थित क्वात्रोचि के खाते फ्रीज करवा दिए गए।
दलाली के पैसे उसी खाते में जमा थे।बाद में केंद्र में आई कांग्रेसी या कांग्रेस समर्थित सरकारों ने इस मामले को दबाने की पूरी कोशिश की।

नरसिंह राव सरकार के विदेश मंत्री माधव सिंह सोलंकी ने तो दावोस में स्विस विदेश मंत्री से यहां तक कह दिया था कि बोफोर्स केस राजनीति से प्रेरित है।इस पर देश में भारी हंगामा हुआ तो सोलंकी को इस्तीफा देना पड़ा।सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि यदि राजीव गांधी ने बोफोर्स की दलाली के पैसे खुद नहीं लिए तब भी उनकी सरकार और अनुवर्ती कांग्रेसी सरकारों ने क्वात्रोचि को बचाने के लिए एंड़ी -चोटी का जोर क्यों लगाया ? पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव ने 2016 में क्यों कहा कि ‘‘मैंने बोफोर्स की फाइल दबवा दी थी ?’’ आखिरकार 4 फरवरी 2004 को दिल्ली हाईकोर्ट ने राजीव गांधी तथा अन्य के खिलाफ घूसखोरी के आरोप खारिज कर दिए। याद रहे कि बोफोर्स मामले की चार्जशीट में 20 जगह राजीव गांधी का नाम आया था।

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वाजपेयी सरकार के अधिकारियों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने में लंबा वक्त लगा दिया। हालांकि 24 अप्रैल, 2004 को अभियोजन निदेशक एस.के.शर्मा ने फाइल पर लिखा कि विशेष अनुमति याचिका दायर की जा सकती है। पर मई में कांग्रेस सत्ता में वापस लौट आई।
तब 1 जून 2004 को उप विधि सलाहकार ओ.पी.वर्मा ने लिखा कि इस मामले में अपील का कोई आधार नहीं बनता। इतना ही नहीं, वर्ष 2011 में बोफोर्स मामले में एक नाटकीय मोड़ आया।
आयकर अपीलीय न्यायाधीकरण ने 3 जनवरी, 2011 को कहा कि विन चड्ढा और क्वात्रोचि को बोफोर्स दलाली के रूप में 41 करोड़ रुपए दिए गए। इसीलिए उन पर आयकर बनता है।
चूंकि क्वात्रोचि की कोई संपत्ति भारत में नहीं थी तो आयकर विभाग ने 6 नंवबर 2019 को मुम्बई में एक फ्लैट जब्त किया। वह फ्लैट विन चड्ढा के पुत्र हर्ष चड्ढा का था। इससे पहले वर्ष 2006 में केंद्र की मनमोहन सरकार ने ए.एस.जी.बी.दत्ता को लंदन भेजा था। उन्होंने लंदन के बैंक में क्वात्रोचि के फ्रिज खाते चालू कराए। जिसमें से उसने रकम निकाल ली।

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वैसे बोफर्स दलाली मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में है। इसमें याचिकाकत्र्ता अजय अग्रवाल की दलील है कि मामला तार्किक परिणति पर नहीं पहुंचा तो इसकी पुनः सुनवाई हो। इसके उलट मोदी सरकार ने माल्या पर रुख इतना सख्त किया कि वह कर्ज लौटाने को तैयार हो गया। किंतु अब सरकार न केवल पूरी वसूली के लिए प्रतिबद्ध है बल्कि उसे सजा दिलाने के लिए भी कटिबद्ध ताकि यह मामला दूसरे लोगों के लिए दृटांत बन कर उनमें डर पैदा कर सके।
क्या बोफोर्स मामले में भी हम ऐसी अपेक्षा कर सकते हैं ?
(वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर के फेसबुक वॉल से साभार, ये लेखक के निजी विचार हैं)

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