Monday, August 19, 2019
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वायनाड में भाजपा है नहीं, सीपीएम के खिलाफ राहुल बोलेंगे नहीं, तो वहां करने क्या गए हैं?

इस लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक चर्चा में है केरल की वायनाड लोकसभा सीट. और हो भी क्यों नहीं, राहुल गांधी पहली बार अमेठी को छोड़कर यहां से चुनाव जो लड़ रहे हैं. आज ही राहुल गांधी ने वायनाड से अपना नामांकन दाखिल किया है और उसी के साथ अपना रोड शो भी किया. राहुल गांधी का अमेठी के अलावा यहां से चुनाव लड़ना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि भाजपा कह रही है कि राहुल गांधी अमेठी में भाजपा से हारने के डर से भागकर केरल जा पहुंचे हैं. वैसे भाजपा ही नहीं, हर कोई यही मान रहा है कि राहुल गांधी इस बार अमेठी में हार सकते हैं.

वायनाड पहुंचे राहुल गांधी ने जब पत्रकारों से बात की तो पहला सवाल यही उठा कि आखिर वह वायनाड से लड़ क्यों रहे हैं? क्‍योंकि यहां तो बीजेपी मुकाबले में है नहीं. केरल में राहुल गांधी की आमद को केंद्र में उसकी पुराने सहयोगी रहे लेफ्ट ने पीठ में छुरा घोंपने जैसा बताया. राहुल को अपने मुखपत्र देशभूमि में पप्पू तक कह दिया. इन सबके बावजूद राहुल गांधी ने कहा है कि वह सीपीएम के खिलाफ कुछ नहीं कहेंगे. यानी राहुल गांधी जहां से चुनाव लड़ने पहुंचे हैं, वहां भाजपा की पकड़ है नहीं और सीपीएम के खिलाफ वह बोलेंगे नहीं. तो फिर राहुल गांधी वायनाड करने क्या गए हैं?

एक चैलेंजर के लिए सुरक्षित सीट तलाशना सही नहीं

देखा जाए तो इस लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी एक चैलेंजर की भूमिका में हैं. एक बड़ी पार्टी का मुखिया होने के नाते उन्हें ऐसी सीट चुननी चाहिए थी जो उनकी पार्टी की ताकत को बढ़ाने का काम करती. लेकिन राहुल गांधी तो यूपी की अमेठी सीट के अलावा एक ऐसी सीट से लड़ रहे हैं, जहां पर उनका भाजपा से कोई मुकाबला नहीं है. कांग्रेस की सीधी टक्कर भाजपा से होने के नाते राहुल गांधी को सुरक्षित सीट ढूंढ़ने के बजाए मोदी को टक्कर देने वाली सीट चुननी चाहिए थी. इस तरह एक सुरक्षित सीट ढूंढ़ना एक ओर तो राहुल गांधी के हार के डर को दिखा रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के अन्य प्रत्याशियों और बाकी की विरोधी पार्टियों का मनोबल भी तोड़ने का काम कर रहा है. 2014 में मोदी अपने घर से निकल कर यूपी में आए थे, जहां जीतना उनके लिए और भी मुश्किल था, लेकिन राहुल गांधी ने इसका उल्टा किया है, जो विपक्ष के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

कमजोरों को हराकर शेखी बघारेंगे राहुल गांधी!

वायनाड सीट पर राहुल गांधी का सीधा मुकाबला लेफ्ट के उम्मीदवार पीपी सुनीर से है. इस लोकसभा सीट पर हमेशा लेफ्ट का दबदबा तो रहा है, लेकिन लेफ्ट की ओर से चुनाव लड़ने के लिए उतारे गए उम्मीदवार पीपी सुनीर काफी कमजोर हैं. वह 1999 और 2004 में अपने गढ़ पोन्नानी से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन जीत नहीं पाए. अब जो अपने गढ़ से ही जीत नहीं सका वह दूसरी जगह से कैसे जीतेगा.

वहीं दूसरी ओर, भाजपा ने अपनी सहयोगी पार्टी भारत धर्म जनसेना (BJDS) से तुषार वेल्लापल्ली को चुनाव मैदान में उतारा है. आपको बता दें कि इनके पिता वेल्लापल्ली नतेशन केरल में बहुत लोकप्रिय हैं. लेकिन ये भी जान लेना चाहिए कि बाप-बेटे में पटती नहीं है. तुषार के चुनाव में खड़े होने के बावजूद पिता वेल्लापल्ली नतेशन उनको ताना मार चुके हैं. भाजपा ने तुषार को मैदान में उतारने का फैसला इसलिए किया है क्योंकि वह एझवा समुदाय से आते हैं और केरल में एझवा का अच्छा दबदबा है. लेकिन गौर करने की बात ये है कि एझवा समुदाय हमेशा से ही लेफ्ट का कट्टर समर्थक रहा है.

ऐसे में भाजपा की सहयोगी BJDS और लेफ्ट यानी LDF ने जो प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं, वो राहुल गांधी के सामने शायद ही टिक पाएं. मुस्लिम-ईसाई बहुल इस सीट पर राहुल गांधी ने दांव काफी सोच-समझ कर खेला है. वहीं लेफ्ट खुलेआम तो राहुल का विरोध कर रहा है, लेकिन उनके विरोध में एक कमजोर प्रत्याशी को उतारकर लेफ्ट ने भी ये साबित कर दिया है कि वह राहुल गांधी को जिताना चाहता है. खैर, राहुल गांधी जीत तो जाएंगे ही, लेकिन क्या कहेंगे? ‘मैंने दो कमजोर लोगों को हरा दिया है…’??? चुनाव ‘लड़ा’ जाता है और कमजोर से की गई लड़ाई एक तरफा होती है.

राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ने का तर्क है कि दक्षिण भारत के लोगों को संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस उनके साथ है. राहुल का मानना है कि भाजपा ने दक्षिण भारत की अनदेखी की है. अब अगर राहुल गांधी की ही बात पर गौर करें तो वह निशाना तो भाजपा पर लगा रहे हैं, लेकिन में अपनी ही पुरानी सहयोगी लेफ्ट के खिलाफ खड़े हैं. ऐसे में देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी को ऐसी जगह से चुनाव लड़ना चाहिए था कि जहां वो देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा से टक्कर लेते.

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