Saturday, July 24, 2021

पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में एक जैसा चुनावी माहौल! अजीब बात है ?

पुलिस अधीक्षक द्वारा की गयी मासिक अपराध गोष्ठी में अपराधों की समीक्षा व रोकथाम हेतु दिये गये आवश्यक दिशा-निर्देश

Maharajganj: पुलिस अधीक्षक महराजगंज प्रदीप गुप्ता द्वारा आज दिनांक 17.07.2021 को पुलिस लाइन्स स्थित सभागार में मासिक अपराध गोष्ठी में कानून-व्यवस्था की...

शायर मुनव्वर राना के बोल, ‘दोबारा सीएम बने योगी तो यूपी छोड़ दूंगा’

लखनऊ: मशहूर शायर मुनव्वर राना एक बार फिर अपने बयान की वजह से सुर्खियों में हैं।उन्होंने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा...

Maharajganj: CO सुनील दत्त दूबे द्वारा कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस महानिदेशक जोन गोरखपुर ने प्रशस्ति पत्र से नवाजा।

Maharajganj/Farenda: सीओ फरेन्दा सुनील दत्त दूबे को थाना पुरन्दरपुर में नवीन बीट प्रणाली के क्रियान्वयन में कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस...

विधायक विनय शंकर तिवारी किडनी की बीमारी से पीड़ित ग़रीब युवा के लिए बने मसीहा…

हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से किडनी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मदद हेतु युवाओं के द्वारा अपील की...

महराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतर्गत SBI कृषि विकास शाखा के सामने से मोटरसाइकिल चोरी

Maharajganj: महाराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतगर्त मंगलवार को बृजमनगंज रोड पर भारतीय स्टेट बैंक कृषि विकास शाखा के ठीक...

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2018 में दो ऐसे चुनाव हुए जिनमें बहुत से वाकये कॉमन दिखे. पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव और जम्मू कश्मीर में निकाय चुनाव. पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव मई में हुए थे और जम्मू-कश्मीर में निकाय चुनाव अक्टूबर में.

दोनों ही चुनावों की खासियत ये रही कि ढेरों उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीते. कोई उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीते इससे अच्छी बात हो भी नहीं सकती. निर्विरोध का सीधा मतलब तो यही हुआ कि एक ऐसा शख्स जो सबको पसंद हो. मगर, दोनों राज्यों में निर्विरोध उम्मीदवार इसलिए जीते क्योंकि दहशत और धमकी के चलते विरोध में किसी ने नामांकन ही नहीं दाखिल किया. लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा चिंता की बात और क्या हो सकती है?

ये घटनाएं आखिर क्या इशारा कर रही हैं?

2 फरवरी को पश्चिम बंगाल के ठाकुर नगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली थी. रैली में भारी भीड़ थी और ये कोई नयी बात भी नहीं थी. कुछेक रैलियों को छोड़ दिया जाये तो मोदी की रैलियों में भारी भीड़ होती ही है. अगर कम भीड़ की सूचना मिल जाती है तो किसी न किसी बहाने दौरा ही रद्द हो जाता है.

रैली में भीड़ बेकाबू होने लगी और कुछ ही देर में भगदड़ मच गयी. प्रधानमंत्री मोदी ने देखा की बार बार अपील का भी असर नहीं हो रहा तो 14 मिनट में ही ये कहते हुए रैली खत्म कर दिये कि दूसरे कार्यक्रमों में भी जाना है. भगदड़ में कुछ महिलाओं और बच्चों के घायल होने की खबर रही जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा.

मोदी से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पूर्वी मिदनापुर के दौरे पर गये थे. शाह की रैली के बाद बीजेपी और तृणमूल कार्यकर्ताओं में झड़प हुई. पता चला बीजेपी कार्यकर्ताओं को ले जा रही गाड़ियों में आग लगा दी गयी और तोड़फोड़ भी हुई. इस घटना में तीन लोग घायल हो गये. घटना के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बातकर चिंता घटना पर जतायी. मालूम हुआ ममता को ये उलाहना अच्छा नहीं लगा और उसी हिसाब से उन्होंने रिएक्ट भी किया.

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अमित शाह की रैली से पहले 21 जनवरी को ममता बनर्जी ने भी एक बड़ी रैली की – यूनाइटेड इंडिया रैली. कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में रैली में उमड़ी भीड़ को देख ममता बनर्जी तो खुश थी हीं, विपक्षी खेमे के तमाम बड़े नेता भी काफी गदगद हुए. पूरी रैली शांतिपूर्वक हुई. कहीं कोई भगदड़, झड़प या हिंसा की खबर नहीं आयी.

जहां तक कानून व्यवस्था की बात है जाहिर है पश्चिम बंगाल पुलिस ने कानून व्यवस्था को देखते हुए इंतजाम तो किये ही होंगे. क्योंकि रैली तो बाकायदा प्रशासन से अनुमति लेने के बाद ही हुई थी. बीजेपी तो रथयात्रा निकालना चाहती थी, लेकिन इजाजत नहीं मिली. कोर्ट से भी सिर्फ रैली की ही अनुमति मिल पायी है.

तो क्या पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ही रैलियों के चलते हिंसा की आशंका बढ़ जाती है? आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि एक रैली पूरी तरह शांत हो और दूसरी न हो पाये? तृणमूल कांग्रेस की रैली शांतिपूर्वक कैसे हो जाती है और बीजेपी की रैलियों में हिंसा क्यों होने लगती है? क्या तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता इतने अनुशासित हैं कि पुलिस के मूकदर्शक बने रहने पर भी कुछ नहीं होता और दूसरे दलों के कार्यकर्ता पुलिस की परवाह ही नहीं करते? अगर ऐसा है फिर तो पश्चिम बंगाल सरकार को अदालत पहुंच कर सबूत के साथ दलील पेश करनी चाहिये.

पश्चिम बंगाल में हिंसा का जो नमूने मई में हुए पंचायत चुनावों के दौरान हुआ उसे क्या समझा जाये? तब तो बीजेपी और वाम दलों सभी का आरोप यही रहा कि हिंसा के शिकार उन्हीं के कार्यकर्ता हो रहे हैं.

कहीं फिर से चुनावी हिंसा का इशारा तो नहीं

2018 में पश्चिम बंगाल में 58,792 सीटों के लिए हुए चुनाव में एक तिहाई से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए थे. ऐसे 20 हजार से ज्यादा निर्विरोध चुने गये उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी रहे जिसके खिलाफ बीजेपी और वाम मोर्चा ने कोर्ट में अपील की. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव रद्द करने से इंकार कर दिया और नतीजे घोषित करने का आदेश जारी कर दिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की भी राय ली थी.

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चुनाव आयोग ने कहा कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. आयोग की ओर से बताया गया कि यूपी 57 फीसदी, हरियाणा में 51 फीसदी और सिक्किम में 67 फीसदी सीटों पर ऐसे ही हालात रहे.

पंचायत चुनावों के दौरान बीजेपी और वाम मोर्चे का इल्जाम था कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता उनके उम्मीदवारों को धमका रहे हैं – और जो उनकी बात नहीं मान रहे उन्हें जान से हाथ धोना पड़ रहा है. दहशत के मारे या तो वे नामांकन दाखिल नहीं कर रहे या फिर वापस लेने को मजबूर हो रहे हैं. जम्मू कश्मीर में तो हिज्बुल कमांडर ने चुनाव में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवारों को ‘आंखों में तेजाब डालकर अंधा’ कर देने की धमकी दे रखी थी. नतीजा ये हुआ कि दो सौ से ज्यादा वार्डों में वोटिंग की नौबत ही नहीं आ सकी क्योंकि सिर्फ एक-एक उम्मीदवार ने ही पर्चा भरा था. जिस किसी ने भी पर्चा भर दिया उसे तो निर्विरोध होना ही था. सबसे ज्यादा हैरान करने वाला वाकया तो बारामूला में दर्ज हुआ – महज एक वोट पाकर एक उम्मीदवार चुनाव जीत गया. पता है क्यों? चुनाव लड़ रहे दूसरे उम्मीदवार भी वोट डालने बूथ तक नहीं पहुंच पाये.

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धीरे धीरे ही सही, आम चुनाव की उल्टी गिनती तो शुरू ही हो चुकी है – सारे राजनीतिक दल भी पूरे चुनावी मोड में आ चुके हैं. ऐसे में पश्चिम बंगाल में जो माहौल दिख रहा है – वो अच्छे संकेत नहीं हैं. राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की अच्छी सेहत की निशानी है, लेकिन उसमें हिंसा का शुमार होना बहुत खतरनाक है.

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