Sunday, July 25, 2021

कितने स्वतंत्र हैं भारतीय युवा – Gorakhpur Times

पुलिस अधीक्षक द्वारा की गयी मासिक अपराध गोष्ठी में अपराधों की समीक्षा व रोकथाम हेतु दिये गये आवश्यक दिशा-निर्देश

Maharajganj: पुलिस अधीक्षक महराजगंज प्रदीप गुप्ता द्वारा आज दिनांक 17.07.2021 को पुलिस लाइन्स स्थित सभागार में मासिक अपराध गोष्ठी में कानून-व्यवस्था की...

शायर मुनव्वर राना के बोल, ‘दोबारा सीएम बने योगी तो यूपी छोड़ दूंगा’

लखनऊ: मशहूर शायर मुनव्वर राना एक बार फिर अपने बयान की वजह से सुर्खियों में हैं।उन्होंने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा...

Maharajganj: CO सुनील दत्त दूबे द्वारा कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस महानिदेशक जोन गोरखपुर ने प्रशस्ति पत्र से नवाजा।

Maharajganj/Farenda: सीओ फरेन्दा सुनील दत्त दूबे को थाना पुरन्दरपुर में नवीन बीट प्रणाली के क्रियान्वयन में कुशल पर्यवेक्षण करने पर अपर पुलिस...

विधायक विनय शंकर तिवारी किडनी की बीमारी से पीड़ित ग़रीब युवा के लिए बने मसीहा…

हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से किडनी की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मदद हेतु युवाओं के द्वारा अपील की...

महराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतर्गत SBI कृषि विकास शाखा के सामने से मोटरसाइकिल चोरी

Maharajganj: महाराजगंज जिले के फरेंदा थाने के अंतगर्त मंगलवार को बृजमनगंज रोड पर भारतीय स्टेट बैंक कृषि विकास शाखा के ठीक...

Download GT App from
Google Play

विज्ञापन के लिए संपर्क करें +91 7843810623 (WhatsApp)

वर्ष 1980 से 1999 के बीच जन्मे बच्चों को आत्ममुग्ध पीढ़ी बताया जाता है। उन्हें गलत तरीके से वर्णित किया जाता है, स्टीरियोटाइप समझा जाता है और उनकी प्रशंसा नहीं की जाती। उन्हें अक्सर गैरजिम्मेदार और आलसी युवा समझा जाता है। लेकिन अपने खर्च करने की आदत के कारण ऐसे युवाओं ने हाल के दौर में मीडिया का ध्यान खींचा है और यह कयास लगाया जा रहा है कि वे अब तक की तमाम पीढ़ियों में सबसे निराश-हताश तो नहीं हैं। ये लोग तेजी से बदलते वैश्वीकृत समाज में पले-बढ़े हैं और अपने बाप-दादाओं के विपरीत उन्हें संक्रमण काल से वयस्कता की ओर बढ़ते हुए विकास संबंधी चुनौतियों के अलावा आधुनिक समय की बढ़ती मांगों के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ा है। बीस साल की उम्र के युवा अपने मनोवैज्ञानिक विकास के महत्वपूर्ण चरण में होते हैं, जिन्हें हमारे समर्थन की जरूरत होती है, उपहास की नहीं।

सहस्राब्दी की शुरुआत में जीवन संबंधी मनोविज्ञान के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन देखा गया। वयस्कता के विकास पर शोध की जरूरत महसूस करते हुए इस दिशा में प्रयास हुए। इस तरह के एक प्रयास ने अमेरिका में उभरती वयस्कता के सिद्धांत को जन्म दिया और 18 से 29 की अवधि को एक नया जीवन-चरण प्रस्तावित किया गया। सांस्कृतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव (यौन क्रांति, महिलाओं के आंदोलन, ज्ञान आधारित अर्थव्यस्था के लिए बदलाव) के साथ हाई स्कूल की पढ़ाई खत्म करने और वयस्क भूमिका प्राप्त करने के बीच खाई बढ़ती गई। वयस्कता की स्थिति के ये चिह्न (वित्तीय स्वतंत्रता, एक स्थायी रोजगार की तलाश और विवाह करना) विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग होते हैं। विकसित देशों में जहां इसका विस्तृत अध्ययन किया गया है, वहीं भारत में इस संबंध में शोध की अभी बस शुरुआत ही हुई है।
भारत ने 1990 के दशक में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेज शुरुआत के बाद सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में तेजी से बदलाव का अनुभव किया है। तेज औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण का आबादी पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। भारत में उभरती वयस्कता तेजी से प्रचलित हो रही है, क्योंकि युवाओं के पास शिक्षा, उच्च वेतन वाली नौकरियां और प्रेम व विवाह में ज्यादा स्वायत्तता प्राप्त है। इसके अलावा बेहतर अवसर की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में युवाओं का सामूहिक पलायन हुआ है, जिसने सामाजिक गतिशीलता को मंजूरी दी है। बदलती सामाजिक-सांस्कृतिक धाराओं और खत्म होती जाति प्रथा के साथ भारत एक नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है।

पिछले एक दशक में भारत के शहरी मध्यवर्ग के परिवारों में बदलावों का सिलसिला शुरू हुआ है। वैश्वीकरण, बढ़ते शहरीकरण और बदलते सामाजिक परिवेश के चलते भारत के उभरते वयस्क बहुत-सी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसने वयस्कता प्राप्त करने के अनुभव को मौलिक रूप से बदल दिया है। विभिन्न संस्कृतियों में वयस्कता प्राप्त करने के सर्वोच्च मानदंडों में से एक है स्वतंत्र फैसला लेने की क्षमता। इसका बाद के जीवन पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है, जिसमें आर्थिक सफलता, सुचारु जीवन बिताना और अंत में सफल बुढ़ापा शामिल है। हालांकि भारत में पारिवारिक दायित्वों और सामाजिक अपेक्षाओं की अब भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, ऐसे में उभरते वयस्क आसानी से स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाते।
उत्तर-औपनिवेशिक यूरो-केंद्रित संस्कृति में भारतीय युवा इस बदलते परिदृश्य के बीच आत्म और पहचान के आख्यानों को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। भारत में एकल परिवार आम होते जाने के साथ-साथ पारिवारिक विचारधारा में बदलाव हुए हैं, जो उभरते वयस्कों के बीच फैसले लेने में माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत की अनुमति देते हैं। यह पुरानी परंपरा से उत्पन्न जड़ता और परिवर्तन के दबाव के बीच पारस्परिक क्रिया को चित्रित करता है।
मेरे हालिया शोध का निष्कर्ष बताता है कि भारत में उभरते वयस्क माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ परिवार से स्वतंत्रता और स्वायत्तता भी हासिल करते हैं, जो जिंदगी के इस क्षण का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। खोज से उनके माता-पिता के प्रति प्रतिबद्धता का तो पता चलता ही है, इसका भी संकेत मिलता है कि व्यक्तिगत जीवन के विकल्प माता-पिता के देखभाल करने की क्षमता को बाधित नहीं करेंगे। भारत के उभरते हुए वयस्क आज भी अपनी पहचान तलाशने और आत्मनिर्भर बनने को उच्च प्राथमिकता पर रखते हैं।
उसके बाद वित्तीय सुरक्षा, शिक्षा और करियर भी महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं। ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के प्रति भारत के झुकाव में वृद्धि के साथ ज्यादा उन्नत डिग्री, व्यक्तिवादी आदर्शों से परिचय, बेहतर संभावनाओं के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन को महत्व दिया जाता है। ये निष्कर्ष भारत के शहरों में रहने वाले 18 से 29 वर्ष के मध्य और उच्च वर्ग के शिक्षित युवाओं पर केंद्रित हैं और ये उन भारतीय युवाओं की भावना को प्रतिबिंबित नहीं कर सकते, जो ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में रहते हैं।
पश्चिम की तुलना में भारत के उभरते हुए वयस्क कुछ अलग हैं। भारत के उभरते वयस्क न केवल अपने माता-पिता के महत्व को पहचानते हैं, बल्कि परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाते हैं। अनुकूल परिणाम सुनिश्चित करने के लिए भारत के उभरते वयस्कों के निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में जानना महत्वपूर्ण है, जो एक सर्वे से संभव नहीं है। इन्हें उस एजेंसी को पहचानने की आवश्यकता होती है, जो जीवन लक्ष्य के प्रति उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होती है, विशेष रूप से तब, जब भारत जैसे समुदाय-केंद्रित समाज की बात हो। इस शोध के निष्कर्षों ने सांस्कृतिक मानदंडों के पुनर्गठन के लिए वैश्वीकरण के समाजशास्त्रीय प्रभावों को प्रकाश में लाया है-कि सफलता को मापने के लिए पैमाने में बदलाव की आवश्यकता है। मीडिया में इन उभरते वयस्कों को पेश करने के ढंग और उनके आदर्शों व लक्ष्यों की वास्तविकता में विसंगति है।

– एस• रंजन राय, गोरखपुर टाइम्स

ये भी पढ़े :  यूपी में पंचायत चुनाव 2021 को लेकर तैयारियां जोरों पर है, कैसे होगा आरक्षण, क्या है सरकार की तैयारी? कब होंगे चुनाव।

Hot Topics

गोरखपुर : सगी बहन से शादी करने की जिद पर अड़ा भाई; यहां जाने क्या है माजरा !

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां चिलुआताल में...

गोरखपुर:चिता पर रखे शव के जीवित होने पर मचा हड़कंप, रोकना पड़ा दाह संस्कार,

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां...

देवरिया:- थाने में ही महिला फरियादी के सामने हस्तमैथून करने वाला थानेदार फ़रार,25 हज़ार के इनाम की घोषणा

देवरिया के अंतर्गत आने वाले थाने भटनी में महिला फरियादी के सामने हस्तमैथुन करने वाली थानेदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज...

Related Articles

शायर मुनव्वर राना के बोल, ‘दोबारा सीएम बने योगी तो यूपी छोड़ दूंगा’

लखनऊ: मशहूर शायर मुनव्वर राना एक बार फिर अपने बयान की वजह से सुर्खियों में हैं।उन्होंने कहा कि अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा...

ब्लाक प्रमुख चुनाव परिणाम: भाजपा के परिवारवाद का डंका, इन मंत्रियों और विधायकों के बहू-बेटे निर्विरोध जीते

लखनऊ: देश की राजनीति में परिवारवाद की जड़ें काफी गहरी हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक वंशवाद और परिवारवाद की जड़ें और भी...

शिवपाल यादव ने दी भतीजे अखिलेश यादव को नसीहत, बोले- प्रदर्शन नहीं, जेपी-अन्ना की तरह करें आंदोलन

Lucknow: लखीमपुर में महिला प्रत्याशी से अभद्रता की कटु निंदा करते हुए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने...
%d bloggers like this: